Home समसामयिक इतिहास और माइथोलॉजी का यथार्थ

इतिहास और माइथोलॉजी का यथार्थ

सबसे पहले तो हमें यह भ्रम दूर कर लेना चाहिए कि महाभारत की रचना वेदव्यास ने की थी। वेदव्यास ने महाभारत नहीं “जय” नामक ग्रंथ लिखा था जिसमें मात्र 8800 श्लोक थे। वेदब्यास के बाद “जय” नामक ग्रंथ के दूसरे संपादक थे “वैसमपायन” जिन्होंने “जय” नामक ग्रंथ को “भारत संहिता” बताकर इसमें 16000 नए श्लोक जोड़ दिए। वैसमपायन के बाद इस ग्रंथ के एक और संपादक हुए “उग्रसूर्वासैती”। जिन्होंने “भारत संहिता” को महाभारत नामक ग्रंथ बताकर उसमें 70000 श्लोक जोड़ दिए। यही “महाभारत” ग्रंथ वर्तमान में हमारे सामने है। आज इस ग्रंथ में एक लाख से ज्यादा श्लोक हैं।

इतिहास तथ्यों पर आधारित होता है। प्रमाणिक होता है जब कि माइथोलॉजी मिथकीय एवं काल्पनिक घटनाओं आदि पर आधारित होती है।माइथोलॉजी में वे काल्पनिक कथाएं होती हैं जिनमें विश्वास निहित होता है। अर्थात माइथोलॉजी का सीधा सम्बन्ध पौराणिक कथाओं से होता है। देश में आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें इतिहास और माइथोलॉजी का अंतर नहीं पता है। वे दोनों को एक साथ लेकर चलते हैं और पौराणिक कथाओं को भी इतिहास का हिस्सा मानते हैं। हैरान तो यह बात करती है कि इस प्रकार के भ्रम में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे लोग फंसे दिखाई देते हैं। अनपढ़ आदमी में इतिहास की समझ नहीं होती है लेकिन पढ़ा-लिखा वर्ग जो इतिहास से खूब परिचित होता है। वह इन मिथकीय पात्रों को भी इतिहास से जोड़कर देखता है।

कई दशक पहले देवकीनंदन खत्री ने एक उपन्यास लिखा था “चंद्रकांता”। देवकीनंदन खुद इस उपन्यास के एक पात्र थे। इसी उपन्यास पर बाद में एक धारावाहिक बना जो दूरदर्शन पर 1994 से शुरू हुआ। यह धारावाहिक काफी पॉपुलर हुआ था। इस उपन्यास की कहानी विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता पर केंद्रित है जो अपनी असली पहचान और अतीत से अनजान है। हालांकि जब नौगढ़ का राजकुमार वीर उसके जीवन में प्रवेश करता है तो उसे अपनी असली मंजिल याद आ जाती है और वह उसे पूरा करने निकल पड़ती है। दो राज्यों के बीच खिंची नफरत की तलवारों के बीच चंद्रकांता और वीर की यह प्रेम कहानी रहस्य, रोमांच, युद्ध और शूर वीरता की दास्तान है।

आज से 200 साल बाद भी अगर इस उपन्यास को भी इतिहास बताकर प्रचारित करवा दिया जाए। इस उपन्यास के नायकों का महिमामंडन शुरू हो जाए और इसके पात्रों के मंदिर बनने शुरू हो जाएं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कोई प्रमाण मांगे तो फट से इतना कह देना ही काफी रहेगा कि देखो आज भी नौगढ़ और विजयगढ़ नामक जगह मौजूद है, तो इसका अर्थ हुआ कि वहां चंद्रकांता भी रही होगी और उसे वीर से प्यार भी हुआ होगा। उन दोनों राज्यों के बीच युद्ध भी हुआ होगा। इसलिए “चंद्रकांता” पूरी तरह से इतिहास है। इस पर उंगली उठाने वालों को देशद्रोही घोषित कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि वह लोग हमारे महान पूर्वजों का सबूत मांग कर उनका घोर अपमान कर रहे हैं। 

आपको यह थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन महाभारत और रामायण नामक उपन्यास और उनके किरदारों के साथ  यही तो हुआ है। यहां हम बात करेंगे केवल महाभारत नामक उपन्यास की। जिसकी रचना वेदव्यास ने की। कब की पता नहीं? कोई इतिहास नहीं? इस ग्रंथ में जो युद्ध हुआ वह कब हुआ पता नहीं? कोई इतिहास नहीं? आज तक महाभारत से जुड़े एक ढेला भी पुरातत्व विभाग को नहीं मिला। जब इस ग्रंथ का कोई काल ही निर्धारित नहीं है, तब हमें इसे किस काल खंड से जोड़ें? 

सबसे पहले तो हमें यह भ्रम दूर कर लेना चाहिए कि महाभारत की रचना वेदव्यास ने की थी। वेदव्यास ने महाभारत नहीं “जय” नामक ग्रंथ लिखा था जिसमें मात्र 8800 श्लोक थे। वेदब्यास के बाद “जय” नामक ग्रंथ के दूसरे संपादक थे “वैसमपायन” जिन्होंने “जय” नामक ग्रंथ को “भारत संहिता” बताकर इसमें 16000 नए श्लोक जोड़ दिए। वैसमपायन के बाद इस ग्रंथ के एक और संपादक हुए “उग्रसूर्वासैती”। जिन्होंने “भारत संहिता” को महाभारत नामक ग्रंथ बताकर उसमें 70000 श्लोक जोड़ दिए। यही “महाभारत” ग्रंथ वर्तमान में हमारे सामने है। आज इस ग्रंथ में एक लाख से ज्यादा श्लोक हैं।

इस ग्रंथ में घोर जातिवाद तो है ही। साथ ही यह ग्रंथ क्षत्रिय को वस्तु के समान दर्शाता है। उसे भाइयों में बांट देता है। उसे जुए में दांव पर लगा देता है। धर्मराज से झूठ बुलवाता है। कर्ण को सूतपुत्र बताता है। विदुर को दासी पुत्र कहता है। नैतिक रूप से देखा जाए तो यह बेहद बचकानी पुस्तक है। हां कहानी के हिसाब से बेहतरीन कल्पना ,कर सकते हैं। यद्यपि  इसकी कहानी पर हम ज्यादा बात नहीं करेंगे। बच्चा-बच्चा इसे जानता है। आप सिर्फ इतना सोचिए कि किस आधार पर इसे ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाए? जबकि इसकी भाषा संस्कृत के 550 साल पहले की कोई भी लिखित साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

जिस काल को महाभारत काल बताया जाता है उस काल की मेसोपोटामिया सभ्यता का इसमें कहीं कोई जिक्र तक नहीं। सिंधु घाटी सभ्यता में महाभारत का कोई नामोनिशान नहीं। आखिर किस आधार पर इसे ऐतिहासिक ग्रन्थ माना जा रहा है?* जिसके किरदारों के जन्म की कोई तारीख और वर्ष दर्ज नहीं। कुछ लोग इसे सिर पर सदियों पुराना मिथक लिए 21वीं सदी में जी रहे हैं। इन लोगों को इतिहास से कोई मतलब नहीं है। इन्हें हर क्षेत्र में अपने धार्मिक उपन्यास को फैलाने की पुरानी, आदत है क्योंकि इन जातिवादी ग्रंथों में इनके पूर्वजों की लिखी इनके हितों की बातें हैं और इन्हीं ग्रंथों की वजह से असमानतावादी लोग सदियों से वर्चस्व में रहे हैं। इतिहास के बारे में परिजीवों के आई टी सेल से जो मटेरियल तैयार होता है उसका वास्तविक इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है। असल में जिनकी वर्तमान में कोई उपलब्धियां नहीं होती वही लोग इतिहास – इतिहास चिल्लाते हैं और जिनका इतिहास ही मनगढ़ंत हो तो सोचिए वे लोग कहां पर खड़े हैं। जब कोई इनकी इस जहालत को दूर करने का प्रयास करता है तो यह लोग उसे गालियां देते हैं। उसे प्रताड़ित करते हैं। यहां तक कि उसे मार डालते हैं। भारत में ईश्वर केंद्रित धर्मों और उसके ग्रंथों के विरुद्ध आवाज आज से नहीं उठ रही है। यह परंपरा भी उतनी ही पुरानी है जितने ये धर्म। जब-जब धर्म जनसमूह के शोषण का आधार बना, तब – तब इसी समाज के लोगों ने उसके विरुद्ध आवाज बुलंद की है।

मेरा मानना है कि इस देश में विद्वानों और युग पुरुषों की एक लंबी परंपरा रही है। चार्वकों से लेकर स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा राव फूले, छत्रपति शाहू जी महाराज, राहुल सांकृत्यायन, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, पेरियार रामास्वामी, ललई सिंह यादव, मा0 रामस्वरूप वर्मा, बाबू जगदेव प्रसाद इत्यादि। इन्हें पढ़कर देखिएगा इतना याद जरूर रखिएगा कि कोई भी धर्म कभी भी इंसानियत का हितैषी नहीं रहा। इतिहास उठाकर देख लीजिएगा। भगत सिंह ने बिल्कुल सही कहा था कि धर्म और ईश्वर को मैं मानवता के लिए सबसे निकृष्ट मानता हूं। धर्म की कोई किताब आलोचनाओं से परे नहीं। वेद, कुरान, बाइबिल, रामायण या महाभारत कोई भी हो। इन सब की रचनाएं इंसानों ने ही की है। हो सकता है इन धार्मिक किताबों में लिखित कुछ बातें तात्कालिक समय के उपयोग के लिए उपयोगी रही हो लेकिन आज इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। भले ही कितना इन्हें जोड़कर वैज्ञानिक साबित करने की कोशिश की जाए यह समाज को पतन में ही ले जाएंगी। जैसे 10 साल पुरानी बुखार की दवा आज किसी के बुखार को ठीक नहीं कर सकती हैं, चाहे वह 10 साल पहले कितनी ही कारगर क्यों ना रही हो, लेकिन आज कूड़े के समान है। वैसे ही आज यह सभी ग्रंथ किसी काम के नहीं हैं। यह समाज के लिए घातक हो चुके हैं। इनका त्याग करना जरूरी है, क्योंकि ये मजहबी किताबें ही सिखाती हैं हमें आपस में बैर रखना।

डॉ हरिश्चन्द्र पटेल (प्रवक्ता),
प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा
उत्तर प्रदेश

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