दूसरों की बातों पर मजा लेने में बहुत दिलचस्पी है हमारी आजकल। पर ,जब दूसरों की जगह हम खुद को पाते हैं, तो हमारे पैमाने बदल जाते हैं। हमारा व्यक्तित्व और हमारा व्यवहार दोनों ही अस्पष्ट होते हैं।

ऐसा लगता है मानो किसी पाखण्डीे ने आदर्शवाद कि दुशाला ओढ़ ली हो।क्यों वह हर व्यक्ति है जो जैसा है वह वैसा नहीं रह सकता ?? आदर्शवाद जैसा व्यक्तित्व और पाखंड जैसा व्यवहार दोनों विरोधी सम्मुख एक दूसरे के सामने खड़े प्रतीत होते हैं। तथा सुविधानुसार कोई भी व्यक्ति जिंदगी के सफर में किसी के भी पाले में खड़ा हो सकता है। यह सुविधानुसार जिंदगी कितनी अच्छी मालूम पड़ती है।हम सब इस आदर्शवादी दुशाला को ओड़ तो लेते हैं,परंतु इससे आगे तक ले जाकर किसी दूसरे व्यक्ति को ढक नहीं सकते।कारण एक – साहस का अभाव।क्योंकि दूसरे तक पहुंचाने में मनुष्यरूपी लोभ और स्वार्थ हमारे समक्ष खड़ा हो जाता है।और हम विवशतापूर्वक इसके आगे अपने घुटने टेक देते हैं। तथा इन्हीं आदर्श और पाखंड रूपी दोनों नावों में सवार होने के कारण हम समाज तथा स्वयं पर अपना भरोसा स्थापित नहीं कर पाते हैं।।

लेखिका: भारती भारद्वाज (MA,B.Ed,M.Ed :Aligarh Muslim University)

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