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बाहर फंसे मजदूरों और छात्रों को लेकर बिहार की सियासत गर्म, आमने-सामने तेजस्वी और JDU

कोटा में फंसे छात्रों ने भी राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि वह उन्हें यहां से निकाले। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके पक्ष में नहीं है। नीतीश कुमार ने योगी आदित्यनाथ के उस फैसले की भी आलोचना की है जिसमें यूपी के सीएम ने कोटा में फंसे छात्रों को निकालने के लिए बसों की व्यवस्था की है। भले ही कोरोना महामारी ने चुनावी सियासत पर फिलहाल ग्रहण लगा दिया है लेकिन नेताओं की नजरें तो चुनाव पर ही टिकी है। बिहार में इस साल विधानसभा के चुनाव होने है।

कोरोना महामारी के बढ़ते संक्रमण के बीच बिहार में सियासत भी तेज हो गई है। फिलहाल देश में 3 मई तक लॉक डाउन है। लॉक डाउन की वजह से लाखों अप्रवासी बिहारी देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे हुए हैं। इतना नहीं राज्य से बाहर पढ़ाई के लिए गए छात्र भी फंसे हुए हैं। अब इन छात्रों और अप्रवासी को लेकर बिहार की सियासत तेज हो गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लॉक डाउन समाप्त होने तक मजदूर हो या फिर छात्र, सभी को यह कह रहे है कि वह जहां है वहीं रुके रहे। राज्य सरकार उनकी हरसंभव मदद करने को तैयार है। हालांकि बिहार के विपक्ष के नेता नीतीश कुमार के इस राय से सहमत नहीं दिखते हैं। बिहार के बाहर फंसे अप्रवासियों की समस्याओं को लेकर पूर्व उप मुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार पर कई सवाल खड़े किए है।

तेजस्वी ने नीतीश को राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए पूछा कि माननीय मुख्यमंत्री जी, आखिर बिहार सरकार और अनिर्णय की स्थिति में क्यों है? अप्रवासी मजबूर मजदूर वर्ग और छात्रों से इतना बेरुखी भरा व्यवहार क्यों है? 3 दिन में बिहार के 3 गरीब मजदूरों की मौत हो चुकी है, उनके प्रति आज संवेदनशीलता क्यों है? तेजस्वी यादव ने कोटा से अपने छात्रों को निकालने के लिए यूपी सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए एक और ट्वीट किया और लिखा कि बिहार के हजारों छात्र कोटा के जिलाधिकारी से विशेष अनुमति लेकर आए। लेकिन बिहार सरकार ने उन्हें राज्य के सीमा पर ही रोक दिया, प्रदेश में घुसने नहीं दिया। विद्यार्थी हो या अप्रवासी मजदूर, बिहार सरकार ने संकट में सभी को त्याग दिया है। इतना ही नहीं तेजस्वी यादव ने अपने ट्वीट के जरिए नीतीश कुमार पर हमला जारी रखते हुए कहा कि अप्रवासी राज्य के मानव संसाधन है। यह सभी कुशल, अर्ध कुशल व अकुशल श्रमिक राज्य के कमाऊ पूत है जो राज्य की अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष 50 से 60 हजार करोड़ का अंशदान देते हैं। उन्हें संकट की घड़ी में राज्य सरकार द्वारा इस तरह छोड़ देना नैतिकता, मानवता और राज्य धर्म के विरुद्ध है।

तेजस्वी के इस आरोप के बाद जदयू के भी तरफ से पलटवार किए जा रहे है। जदयू ने तेजस्वी को चिंता नहीं करने की नसीहत देते हुए कहा कि जो लोग बिहार में बाहर से आए हैं या फिर बिहार के लोग जो बाहर फंसे हैं, सभी की चिंता नीतीश सरकार कर रही है। उनके रोजगार से लेकर उनके खाने-पीने तक की व्यवस्था भी नीतीश सरकार कर रही है। तेजस्वी के राज धर्म वाले नसीहत पर जदयू के फायरब्रांड नेता अजय आलोक ने भी पलटवार किया है। अजय आलोक ने कहा कि मानवता, राज धर्म, नैतिकता का पाठ विपदा और आपदा की घड़ी में ऐसे लोग पढ़ा रहे हैं जिनका इन तीनों शब्द से कभी कोई वास्ता नहीं रहा। सर्टिफाइड भ्रष्टाचारी पार्टी के यह लोग बताएं कि जो धन भ्रष्टाचार से अर्जित किया है आज उस पर पहला हक किसका है। दान का धर्म आज करो पाप कम हो जाएंगे। कुछ दिन पहले जदयू से निकाले गए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला किया है। प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर कहा कि देशभर में बिहार के लोग फंसे पड़े हैं और नीतीश कुमार लॉक डाउन की मर्यादा का पाठ पढ़ा रहे हैं। स्थानीय सरकार कुछ कर भी रही है लेकिन नीतीश जी ने संबंधित राज्यों से अब तक कोई भी बात नहीं की है। प्रधानमंत्री के साथ बैठक में भी उन्होंने इस बात का कोई जिक्र नहीं किया। इस बीच में बिहार सरकार पर कोटा में फंसे छात्रों को वहां से निकालने का दबाव बढ़ता जा रहा है।

दरअसल कोटा में फंसे छात्रों ने भी राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि वह उन्हें यहां से निकाले। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके पक्ष में नहीं है। नीतीश कुमार ने योगी आदित्यनाथ के उस फैसले की भी आलोचना की है जिसमें यूपी के सीएम ने कोटा में फंसे छात्रों को निकालने के लिए बसों की व्यवस्था की है।  भले ही कोरोना महामारी ने चुनावी सियासत पर फिलहाल ग्रहण लगा दिया है लेकिन नेताओं की नजरें तो चुनाव पर ही टिकी है। बिहार में इस साल विधानसभा के चुनाव होने है। ऐसे में अप्रवासी बिहारियों और छात्रों की समस्या को उठाकर विपक्ष नीतीश कुमार पर हमलावर हो रहा है। तो वहीं सत्ता पक्ष अपने कामों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश भी कर रही है। इस साल का विधानसभा चुनाव ना सिर्फ नीतीश कुमार के लिए अग्निपरीक्षा होगा बल्कि तेजस्वी यादव पर भी लालू की अनुपस्थिति में अपनी पार्टी के परफॉर्मेंस को अच्छा करने का दबाव रहेगा। 

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