Home COVID-19 कोरोना पीड़ितों की सेवा के नाम पर कई NGO चला रहे हैं...

कोरोना पीड़ितों की सेवा के नाम पर कई NGO चला रहे हैं गोरखधंधा

भारत में जितने भी गैरसरकारी संगठन हैं, सभी ऊंचे मूल्यों को स्थापित करने की, सेवा एवं परोपकार की आदर्श बातों के साथ सामने आते हैं पर धन उगाहने की होड़ में सभी एक ही स्वार्थ एवं जेब भराई की संस्कृति को अपना लेते हैं।

हम इतिहास की सबसे भयंकर, दुखद एवं मानव विनाशक घटना के गवाह बन रहे हैं। इस महामारी से लड़ने के लिए जहां एकजुटता एवं संकल्प की जरूरत है, वहीं सेवा-प्रकल्प भी जरूरी है। अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं गैरसरकारी संगठन आज लाखों गरीबों को हर रोज खाना दे रहे हैं, लॉकडाउन के दौरान मानव सेवा के विविध जनकल्याणकारी कार्यों जुटे हैं, लेकिन देश में ऐसे भी गैर सरकारी संगठन हैं, जो सेवा के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध करने, शोषण एवं कमाई करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे ही स्वार्थी, अमानवीय एवं लोभी संगठनों पर निगरानी के लिये गृहमंत्रालय ने अपनी नजर को पैनी की है। जो एनजीओ संदेह के घेरे में हैं, जिनकी गतिविधियां संदिग्ध है, जिनके कामकाज में पारदर्शिता नहीं है, उन पर गृह मंत्रालय ने सख्ती बरतते हुए कहा है कि वे कोरोना वायरस महामारी से जूझने के लिए किए जा रहे प्रयासों से हर माह सरकार को अवगत कराएं। जिन गैरसरकारी संगठनों को एफसीआरए के प्रावधानों के अनुरूप विदेशों से फंड मिलता है, उन्हें कोरोना महामारी पर अपनी गतिविधियों की आनलाइन रिपोर्ट देनी होगी। क्योंकि इन गैरसरकारी संगठनों की मूल्यहीनता एवं बेईमानी से कोरोना पीड़ितों की सहायता की बजाय खुद की जेब भराई का षडयंत्र ही दृष्टिगोचर हो रहा है।

भारत में जितने भी गैरसरकारी संगठन हैं, सभी ऊंचे मूल्यों को स्थापित करने की, सेवा एवं परोपकार की आदर्श बातों के साथ सामने आते हैं पर धन उगाहने की होड़ में सभी एक ही स्वार्थ एवं जेब भराई की संस्कृति को अपना लेते हैं। मूल्य की जगह मनी और सेवा मुद्दों की जगह शोषण करने लगते हैं। जब एक अकेले व्यक्ति का जीवन भी मूल्यों एवं पारदर्शिता के बिना नहीं बन सकता, तब एक राष्ट्र गैरसरकारी संगठनों की मूल्यहीनता एवं बेईमानी में कैसे शक्तिशाली बन सकता है? गृहमंत्रालय की इन गैरसरकारी संगठनों पर सख्ती बरतना औचित्यपूर्ण है। कोरोना महामारी पीड़ितों की सहायता एवं सेवा की प्रक्रिया को गैरसरकारी संगठनों ने अपने स्तर पर भी कीचड़ भरा कर दिया है। क्योंकि इन एनजीओ की शक्ति धन जुटाने के लिये झूठे हाथ जोड़ने में, झूठे दांत दिखाने में, फोटो खिंचवाने व प्रचार-प्रसार पाने में लग जाती है। ऐसे एनजीओ लोक कल्याण की सोचेंगे या स्वकल्याण की? 

इन तथाकथित एनजीओ को प्राप्त धन से कुछ लोगों ने अपने बड़े एम्पायर खड़े कर लिए हैं और उनके लिये कोरोना कहर सच्ची सेवा का नहीं बल्कि अपने साम्राज्य को विस्तार देने एवं उसे शक्तिशाली बनाने का अवसर है। कई मामलों में गैर सरकारी संगठन देश विरोधी कामों तक में लिप्त पाए गए तो कई ऐसे संगठन भी हैं जिनका संचालन किसी निजी कम्पनी से भी गया-गुजरा है। सेवा, परोपकार, मानवता के कल्याण के नाम पर देश-विदेश से दान में लिये धन का इस्तेमाल ये अपनी भलाई और मलाई का जुगाड़ करने के लिए कर रहे हैं। एनजीओ के गडबड़जाले में बहुत बड़े-बड़े लोग शामिल हैं इसलिए इन पर हाथ डालना मुश्किल एवं चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन गृहमंत्रालय ने इस चुनौती का स्वीकार किया है तो इससे इन एनजीओ में पारदर्शिता आने की, जनता के दान में दिये धन के सही उपयोग होने एवं जरूरतमंदों की वास्तविक सहायता एवं सेवा होने की संभावनाओं को बल मिला है। कोरोना महामारी फैलने से पहले ही इन संदिग्ध एनजीओ पर कठोर कार्रवाही होने लगी थी, हजारों एनजीओ के लाइसैंस इसीलिए रद्द किये गये थे। अन्यथा ”जैसा चलता है- चलने दो” की पूर्व सरकारों की मानसिकता और कमजोर नीति ने इन एनजीओ के हौसले बढ़ा दिये और वे खुलकर इनकी आड़ में दान के धन को व्यक्तिगत उपयोग में लेने लगे, काले धन को सफेद करने लगे।

देश में एनजीओ का मकड़जाल चरम पर पहुंच चुका है, यह एक कालाधंधा बन चुका है। इस समय देशभर में लगभग तीस लाख एनजीओ पंजीकृत हैं। ये एनजीओ सरकारी अनुदान (ग्रान्ट) और सामाजिक दान व चन्दा लेकर अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। देश में इन पंजीकृत एनजीओ में से कई लाख एनजीओ ऐसे भी हैं, जो विदेशों से बड़ी संख्या में पैसा हासिल कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर तो आयकर रिटर्न भी नहीं भरते हैं और उनका हिसाब भी कोई लेने वाला नहीं है। पिछले पांच वर्षों के दौरान गृह मंत्रालय ने ऐसे ही 14,500 एनजीओ का पंजीकरण रद्द किया है। पिछले तीन वर्षों के दौरान 6,600 संगठनों का लाइसैंस एफसीआरए के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर रद्द किया जा चुका है। एफसीआरए के तहत इन पंजीकृत एनजीओ को कई सौ लाख करोड़ विदेशी फंड के रूप में प्राप्त हुआ है।

एनजीओ के नाम पर अनेक लोगों ने मोटी कमाई की है, तबलीगी जमात जैसे संगठनों ने इस धन का उपयोग देश को तोड़ने के कामों में किया हैं। कुछ ने धर्मांतरण का खेल खेला। मानवाधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाले संगठन मानव के ही सबसे बड़े शोषक बन कर उभरे। महिला-बालिका कल्याण, समाज कल्याण, महिला सशक्तिकरण, बेसिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण-संरक्षण, वृक्षारोपण आदि के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों में अनियमितताओं का बोलबाला रहा। ऐसा नहीं है कि सभी एनजीओ भ्रष्ट एवं काले-कारनामों में लिप्त है, कुछ संगठनों का काम काफी सराहनीय रहा क्योंकि उनका काम बोलता भी है और दिखाई भी दे रहा है और वे ही एनजीओ होने की सार्थकता सिद्ध करते हैं। तभी कोरोना की त्रासद स्थितियों को देखते हुए गृह मंत्रालय ने पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि वे भूखों को भोजन देने, जानवरों को अनाज देने, बेरोजगार लोगों, बेघर दिहाड़ीदार मजदूरों को शैल्टर और सामुदायिक रसोई स्थापित कर उनके लिए भोजन की व्यवस्था करने में सहयोग करें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अनेक एनजीओ सहायता करने के लिए आगे भी आए हैं। व्यक्तिगत रूप से भी लोग यथासम्भव सहायता कर रहे हैं। स्पष्ट है कि महामारी से लम्बी लड़ाई कोई भी सरकार अकेले नहीं लड़ सकती, उसे समाज का सहयोग चाहिए, जिनमें वास्तविक एनजीओ की भूमिका उपयोगी है। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, सेवा, परोपकार और सहयोग से ही कोरोना पीड़ितों की उम्मीदों को साकार किया जा सकेगा।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि अनेक एनजीओ कोरोना पीड़ितों की सेवा के नाम पर गडबड़जाले कर रहे हैं। ऐसे एनजीओ पर निगरानी रखने के साथ अंकुश लगाने की भी आवश्यकता है। देश में ऐसे ठेकेदार भी बहुत मालामाल बने हुए हैं जो इन एनजीओ के पंजीकरण से लेकर प्रोजेक्ट बनाने तक का ठेका लेते हैं और बदले में मुंहमांगी रकम ऐंठते हैं। बेहद आश्चर्य की बात तो यह है कि ये ठेकेदार प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में पंजीकृत संस्था की वार्षिक गतिविधियों से लेकर उसके खर्च तक के दस्तावेज भी तैयार करके देते हैं, भले ही संस्था ने किसी को मटके का एक गिलास पानी तक न पिलाया हो। ऐसे शातिर लोग अपने पूरे परिवार और सगे संबंधियों के नाम पर दर्जनों एनजीओ का संचालन इसी तरह कागजों में करते रहते हैं। ऐसे ही एनजीओ ने कोरोना की महामारी के समय भी सारी मानवीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर लोगों को ठगने एवं गुमराह करने की गतिविधिया उग्र कर रखी है, उनके लिये यह समय दानवीर एवं उदार लोगों की मानवीयता को भुनाने एवं उनकी जेबें खाली कराने का स्वर्णिम अवसर है। ये एनजीओ एवं उससे जुड़े शातिर लोग कोरोना पीड़ितों की सेवा के नाम पर करोड़ों रूपया देश-विदेश से सामाजिक दान के रूप में हासिल करने में सफल भी रहे हैं। भारत में ये एनजीओ न केवल कोरोना मुक्ति के प्रयत्नों में बल्कि राष्ट्रीय हितों में घातक बन रहे हैं। देश भर में ऐसे एनजीओ पर पैनी नजर रखना जरूरी है। सरकार किसी के काम में बाधक नहीं है लेकिन एनजीओ को अपना काम ईमानदारी, पारदर्शिता एवं सेवाभावना से करना चाहिए। काम किया है तो सामने आना ही चाहिए और प्रोत्साहन भी मिलना ही चाहिए। गृहमंत्रालय की पहल से एनजीओ जब अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट सरकार को देंगे तो इस बात का आकलन हो जाएगा कि क्या उन्होंने वास्तव में कोरोना संक्रमण में सेवा एवं मानव कल्याण के कार्य किए हैं या फिर अपनी जेब भरी।

4 COMMENTS

  1. हैलो Editor Saab

    (@ Aajkya.com)

    मेरा नाम विश्व प्रताप गर्ग है और मेरे सहकर्मी देवेन्द्र परमार भगवान शिव के महायोगी स्वरुप भगवान “गुरू गोरखनाथ” के अनुयायी हैं।

    आपकी पोस्ट “कई NGO कोरोना पीडितों के नाम पर गोरख-धंधा चला रहे हैं प्रशंसनीय है। आपने तथाकथित NGOS के द्वारा किए जा रहे घपले को बखूबी उजागर एक नया ही द्रष्टिकोण हमारे समक्ष दिया। तारीफ जितनी की जाए कम है। पूरी पोस्ट पढते हुए रोचकता अन्त तक बनी रही। बहरहाल सुझाव है कि” कई NGO कोरोना पीडितों के नाम फर्जीवाड़ा /गडबडघोटाला” कर रहे हैं उचित वाक्य है “गोरख-धंधा” शब्द अनुचित है ।

    प्रयोग कहा कहा हुआ – 1) Heading में
    2) 3rd Para, 9th Line – NGO के गोरखधंधे में बहुत बड़े बड़े लोग शामिल हैं ।
    3) 6TH Para 2nd Line – अनेक NGO कोरोनो पीडितों की सेवा के नाम पर गोरख-धंधा कर रहे हैं ।

    सर, अनन्त कोटि ब्रह्मांड नायक एक शिवलिंग स्वरुप भगवान शिव महायोगी स्वरूप में “गुरू गोरखनाथ” होते हैं। भगवान शिव को चाहें आप देवों के देव “महादेव” के रूप में पूजे या भक्त वत्सल “भोलेनाथ” के रूप में या फिर महायोगी भगवान शिव के गुरू स्वरूप “गुरू गोरखनाथ” के रूप में। वह तो हर रूप में शिव ही हैं और शिव ही रहेंगे जो सदैव भक्तजनों का कल्याण ही करते हैं कोई धंधा नहीं। भगवान शिव के अति पवित्र कल्याणकारी नाम भगवान गुरू “गोरख” को किसी घटिया धंधे से जोडने से लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है। और शिवजी की गरिमा का हनन भी होता है।

    सादर विनती है और अपील भी अगर आप इस वाक्य को सही कर लें और भविष्य में इस अवांछित शब्द के स्थान पर किसी बेहतर संज्ञा जैसे ठगधंधा /कपटजाल अनैतिक धंधा /अनाचारी धंधा /अवैध धंधा/ अनैतिक धंधा / कालाबाजारी भ्रष्टाचार /भंवरजाल /मकड़जाल /घपला / गोलमाल / घोटाला / तिलिस्मी जाल/गडबडझाला /गडबडघोटाला/धांधली इत्यादि जैसे शब्दों का प्रयोग करें और एक विज्ञप्ति जारी कर रिपोर्टिंग टीम को इस पहलू की ओर भविष्य में भी प्रयोग करने से बचें तो आपकी ज्वलंत पत्रकारिता उम्दा ही प्रतीत होगी। और पाठकगण एक जुडाव भी महसूस करेंगे।

    अलख निरंजन!!

  2. Himanshu Ji,

    Thanks for taking our request into consideration.

    Agar aap Heading bhi correct kar dete to Meharbaani hoti

    Alakh Niranjan!

    • आप हैडिंग का सुझाव दे
      यदि हमें उचित लगा तो हम अवश्य ही लगायेंगे
      मैं भी गुरू गोरखनाथ जी की पूजा करता हूं
      यदि आप या आपका कोई मित्र किसी भी तरह का आर्टिकल, लेख इत्यादि लिखते है तो हमें दे हम आपकी बात को अपने व्यूअर्स तक पहुंचायेंगे।

Leave a Reply

Most Popular

‘‘खुला लॉकडाउन’’ (लॉकडाउन कें बाद का प्रभाव)

खुला लॉकडाउन खुशियाँ आई, बंद कमरे से मुक्तियाँ पाई।अर्से बाद शहर नें ली अंगड़ाई, मोटर गाड़ी दौङ लगाई।।

SP विक्रान्तवीर के दिशानिर्देश पर उन्नाव पुलिस ने तिहरे हत्याकांड का किया खुलासा

दो आरोपी गिरफ्तार जबकि तीसरे आरोपी की गिरफ्तारी के प्रयास जारी रिपोर्ट बाबू सिंह एडवोकेट

समाज को आगे बढ़ाने में प्रयासरत है शिल्पी पटेल

भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी संस्कृति रही है, हमारे प्राचीन काल से नारी का स्थान सम्माननीय रहा है और कहा गया है...

कभी अभिमान तो कभी स्वाभिमान है पिता

कभी अभिमान तो कभी स्वाभिमान है पिताकभी धरती तो कभी आसमान है पिताजन्म दिया है अगर माँ ने जानेगा जिससे जग...
Click to Hide Advanced Floating Content

COVID-19 INDIA Confirmed:174,496 Death: 4,983 More_Data

COVID-19

Live Data