छात्र देश-विदेश में बजा रहे है इनके नाम का डंका

किसी भी मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन मे शिक्षक ही एक मात्र ऐसा इंसान होता है, जो अपने दम पर उसके भविष्य का निर्माण करता हैं। एक टीचर बाग का एक माली होता हैं और छात्र फूल की तरह होते और स्कूल एक बाग होता है। जहां एक टीचर अपनी छत्र छाया में फूल की भांति छात्र को बड़ा करता है। इसके अतिरिक्त एक विद्यार्थी को अपने पूरे जीवन में कई ऐसे मोड़ को देखना पड़ता है, जिसमे उन्हें कोई न कोई व्यक्ति बतौर शिक्षक मिल जाता है।

परंतु अधिकतर छात्र इस बात को भूल जाते है जो शिक्षक हमारे भविष्य को संवारने में दिन रात मेहनत करते है, उनका भूतकाल किन परिस्थितियों में गुजरा होगा, हमे आज जो इतनी अच्छी शिक्षा हमारे शिक्षक द्वारा दी जा रही है, क्या हमारे शिक्षक को भी उतनी ही अच्छी शिक्षा प्राप्त हुयी थी? हमारे द्वारा कभी भी अपने शिक्षक से यह जानने का प्रयास तक नहीं किया जाता कि आप द्वारा जो हमे शिक्षा दी जा रही है, आपको वह शिक्षा किनके द्वारा प्रदान की गयी! अर्थात् आपके शिक्षक कौन थे। आप द्वारा शिक्षा गृहण करते हुये क्या परिस्थितियां थी। आज के समय में विद्यार्थी बिना बाईक व एक्टीवा के स्कूल व टयूशन तक जाना पसंद नहीं करते, शिक्षक के समय में क्या साईकिल भी होती थी, या पैदल ही शिक्षा ग्रहण करते थे। आज के समय में प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग शिक्षक, छात्रों का मार्गदर्शन करते है, परंतु पूर्वकाल में एक ही शिक्षक सभी छात्रों का मार्गदर्शन कर उन्हे कामयाब बनाते थे। ऐेसे ही एक शिक्षक है दीपक शर्मा, जो वर्तमान में सहारनपुर पब्लिक स्कूल, सहारनपुर में विज्ञान व मैथ्स के प्रोफेसर है। इनके द्वारा अपने अनुभव, प्रयासों व कड़ी मेहनत से अपने छात्रों को इतने काबिल बनाया कि इनके पढ़ाये हुये छात्र देश-विदेश में अपनी शिक्षा के प्रभाव का डंका बजा रहे है और वहां के स्थानीय लोगों के दिल में जगह बना रहे है। हालांकि मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं कि वर्तमान में, मैं बतौर एक लेखक के रूप में कार्य कर रहा हूं, परंतु मैं भी श्री दीपक शर्मा जी की छत्रछाया में पढ़ा हुआ हूं। मेरे दिल में यह बात हमेशा घर करती थी कि हमारे टीचर ने किन परिस्थितियों में स्वयं की शिक्षा ग्रहण की होगी और यह बात को लेकर ही मैं अपने टीचर से मिलने उनके घर गया और सारी बातों का उत्तर मेरे टीचर द्वारा बताया, हालांकि इस दौरान उन्होंने डाटा नहीं, परंतु वह पहले हमें पढ़ाते हुये मारते भी बहुत थे।

अध्यापक श्री दीपक शर्मा जी से हुयी वार्ता के दौरान उन्होनें बताया कि मेरा जन्म 19 सितम्बर 1978 को सहारनपुर में हुआ। मेरे पिताजी का नाम राजेश्वर प्रसाद शर्मा व माता श्रीमति बाला शर्मा है, मेरी हाईस्कूल 1994 व इंटरमीडिएट 1996 में राजकीय इंटर काॅलेज, सहारनपुर से हुयी। इसके पश्चात् मेरे द्वारा सहारनपुर से ही बी.एस.सी, बी.एड., एम.ए. (एजुकेशन) व एम.एस.सी. मैथ्स व जी.एन.आई.एस का डिप्लोमा आदि की शिक्षा ग्रहण की।

जीवनकाल के प्रश्न पर उन्होंने बताया कि हमारे पिताजी द्वारा गांव से पलायन करके सहारनपुर जैसे अजनबी शहर में आकर बसे थे। बड़ा शहर था, लोग नये थे, किसी भी तरह की कोई जानकारी पिताजी को नहीं थी। पिताजी ने शहर में अपना जीवनकाल एक मुनीम की नौकरी एक कपड़े की दुकान पर करके किया, प्रारंभ में किराये के मकान में रहे, इस दौरान मैं, मेरी बड़ी बहन व माता जी होती थी। मैं आपको बता दूं कि मेरी बड़ी बहन रीता शर्मा ने मेरे भविष्य को लेकर बेहद प्रयास किये, उनकी मेहनत से ही मैं आज इस मुकाम तक पहुंच सका हूं। हालांकि पिताजी को कपड़े की दुकान से इतनी आय नहीं थी कि वह अपने परिवार का पालन पोषण कर सके। अजनबी शहर था कोई जानता तक नहीं था, इसलिए किसी ने कोई मदद नहीं की। मैने स्वयं कक्षा 5 से ही काम करना शुरू कर दिया, स्कूल से आने के बाद मैं दोपहर से रात्री तक काम पर जाता था, उसके बाद घर पर बहन मुझे पढ़ाती थी। यहीं वजह रही कि मेरा खेलकूद की तरफ कभी लगाव नहीं रहा और न ही मैं कभी जल्दी से कोई खेल, खेल पाया। हालांकि इस दौरान बच्चे मजाक भी बनाते थे, परंतु घर की आर्थिक स्थिति को समझते हुये मेरे द्वारा कार्य करना ही उचित समझा। कक्षा 7 में ही मैं आर.एस.एस. संघ की शाखा से जुड़ा। मेरे अच्छे कार्य का परिणाम यह रहा कि मुझे कक्षा 9 में ही शाखा का मुख्य शिक्षक बना दिया गया। इसके साथ ही आर.एस.एस. का आई.टी.सी. का कोर्स भी मेरे द्वारा देवबंद स्थित भायला से किया। हाईस्कूल उत्तीर्ण करने के पश्चात् दिल में इच्छा जाग्रत हुयी कि ब्राह्मण होने के कारण कर्मकांड आदि का कार्य भी सीखना चाहिए, इसके लिए मैं व मेरा एक मित्र संदीप (जो वर्तमान में मेरठ में है) दोनो ही कीर्तन भवन स्थित रानी बाजार में कर्मकांड सीखते थे और शाम को समस्त मंदिर की साफ सफाई का जिम्मा भी हम दोनो पर था। इस दौरान हमारे गुरू विद्वान पं. चंद्रपाल जी व पं. सुभाष जी द्वारा हमें कर्मकांड का कार्य सफल रूप से सिखाया गया। कर्मकांड सीखते-सीखते एक बात हमें घर कर गयी कि 15 वर्ष के बाद बालक को अपने पिता से अपने खर्च के लिए धन की मांग नहीं करनी चाहिए और इस कारण मेरे द्वारा यह दृढ निश्चय किया गया कि मैं अपने पिता से आज के बाद कभी भी कोई धन नहीं लूंगा और अपने कमाये हुये समस्त धन भी उनके हाथो में लाकर दूंगा। बी.एस.सी की शिक्षा ग्रहण करते-करते बहन के प्रोत्साहन पर मेरे द्वारा होम टयूशन पढ़ाने शुरू कर दिये गये, हालांकि इस दौरान बच्चों के घर दूर होने के कारण व धन अभाव के कारण साईकिल पर ही जाता था। वर्ष 2000 में बहन का विवाह रूड़की कर दिया गया, हालांकि बहनोई भी एक शिक्षक ही है, जो कम्प्यूटर संस्थान को संचालित करते है। वर्ष 2001 में साउथ अफ्रीका में नौकरी करने का आँफर आया, जिसपर मैं एक अंजान देश साउथ अफ्रीका चला गया। हालांकि साउथ अफ्रीका एक मासाहार देश है, फिर भी मेरे द्वारा अपना ब्रहमचार्य का पालन निभाते हुये केवल ओर केवल आलू व फल पर ही आश्रित रहा। साउथ अफ्रीका देश के हालात खराब होने पर वर्ष 2003 में भारत वापसी हुयी, हालांकि इस दौरान मैं फिर पहले की तरह एकदम से धरातल पर आ गया और यहां से मैने अपनी पढ़ाई को ही अपना जीविका का हथियार बनाते हुये स्कूल में पढ़़ाना शुरू किया और आज लगभग दो दशक पूर्ण होने को आ रहे है, मैं तब से ही पढाता आ रहा हूं और मेरे द्वारा दी गयी शिक्षा का नतीजा यह है कि आज मेरा ही विद्यार्थी मेरा इंटरव्यू लेने आया है। वहीं वर्ष 2007 में मेरा विवाह शालिनी शर्मा से हुआ, वह स्वयं भी एम.ए. बी.एड है और एक शिक्षिका के रूप में अपना कार्य सकुशल सम्पन्न कर रही थी, इस दौरान पुत्र भवकुश की प्राप्ती के बाद भी उनके द्वारा बतौर शिक्षिका का कार्य महानगर के प्रतिष्ठित स्कूल क्रमशः पाईनवुड व आर्य कन्या इंटर काॅलेज में किया जाता रहा। वहीं शालिनी शर्मा अब एक ग्रहणी के रूप में अपना कार्य सम्पन्न करती आ रही है, इन्हीं के प्रयासों से ही मैने एक गैर पंजीकृत संस्था ‘प्रयास एक संकल्प’ की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य निर्धन एवं असहाय विद्यार्थीयों की मदद करना है। वर्तमान में मैं पंजीकृत संस्था श्याम स्मृति विद्या प्रचारिणी में बतौर सचिव के पद पर तैनात हूं। इसके अतिरिक्त अपने मित्र डाॅ आदित्य राठी की संस्था ‘प्रगति सोशल वैलफेयर सोसायटी’ के द्वारा भी सामाजिक कार्यो में बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया जा रहा है। वहीं मेरे द्वारा प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी महोत्सव पर सरस्वती पूजन का कार्यक्रम भी किया जाता है। इसके अतिरिक्त मैं एक लेखक के रूप में भी कार्य कर रहा हूं, जिसपर मेरे द्वारा एक पुस्तक लेखन का कार्य भी किया जा रहा है, इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न समाचार पत्रों में भी मेरे लेख छपते रहते है। इति

एक टीचर के अथक मेहनत का प्रयास ही होता है कि हमारे में से कोई अधिवक्ता, अधिकारी, डाॅक्टर, साॅल्जर आदि बनते है। टीचर को सदैव एक भगवान का रूप दिया गया है, क्योंकि वह व्यक्तियों के भविष्य का निर्माण करता है, इस कारण उन्हे सर्वथा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। कोई भी व्यक्ति अपने टीचर का ऋण कभी नहीं चुका सकता, चाहे वह कितना भी बड़ा अधिकारी ही क्यों न बन जाये। इसलिए टीचर का सम्मान करना जरूरी है।

अंत में मैं बहुत धन्य हूं कि मुझे दीपक शर्मा द्वारा शिक्षा दी गयी जिस कारण मैं समाज में अपना सिर गर्व से ऊँचा उठा सकूं।