भूखे-प्यासे लोग पैदल और साईकिल से हज़ारों किलोमीटर का सफ़र कर घरों को जाने को मजबूर, शासन-प्रशासन की ओर मदद को ललचाई आँखें

शेख़ परवेज़ आलम

बेहट (सहारनपुर) सफर की मुश्किलें जाकर जरा तुम उनसे पूछो, हजारों मील पैदल चलके जो घर जा रहे हैं। सुलगती धूप है सर पर न चप्पल पांव में हैं, करो मत बात रोटी की वो पत्ते खा रहे हैं। शायर डॉ साबिर बेहटवी का ये शेर मौजूदा हालातों से गुज़र रहे उन मजदूरों पर बिल्कुल सटीक बैठता है जो सैकड़ो किलोमीटर पैदल या साइकिल से अपने घरों के लिए निकले है।

लोकडाउन को आज लगभग 50 दिन हो गए हैं। दुनिया के बड़े बड़े देशों ने मौत का मंज़र देखा है, भारत देश भी इस ख़तरनाक बीमारी से जूझ रहा है। कई देशों ने इस बीमारी के ख़ात्मे के लिए वैक्सीन बनाने का दावा भी किया है। लेकिन अभी ज़ाहिरी तौर पर कुछ भी कहना मुनासिब नहीं होगा। उस वक़्त के हालात को देखकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने जनता लोकडाउन की अपील की थी। जिसको धीरे धीरे बढ़ा दिया गया था।

लोकडाउन लगने के बाद जो जहां था वहीं रह गया। इस लोकडाउन में सबसे ज़्यादा अगर किसी तबक़े को जान-माल का नुकसान हुआ है तो वो है देश का ग़रीब और मज़दूर पेशा व्यक्ति, आपको इस लोकडाउन में भी सड़क पर सिर पर कपड़ों की गठरी, हाथ में थैला, चेहरे पर रास्तों से मिलने वाले दर्द की झलक लिए ज़ारकतार जो लोग दिखाई देंगे वो हैं देश के ग़रीब और मज़दूर, जो लोकडाउन कि वजह से बन्द हुए कारोबार और वक़्त की मार से परेशान होकर भूखे-प्यासे तेज़ धूप, आँधी-तूफ़ान व बारिश का सामना करते हुए अपनी जान जोख़िम में डालकर हज़ारों किलोमीटर से साईकिल और पैदल सफ़र पर निकला है। छालों से भरे नन्हें पांव हो या सामान का बोझ झेलता कमज़ोर जिस्म, दर्द में तड़प कर बार बार अपने खून को निहारती ममता भरी आंखें हो या फ़िक्र में माथे पर आने वाले ज़िम्मेदारी के शल हों सबका गवाह वो रास्ता है जिसने इनकी तकलीफों को देखा है।

यूँ तो शासन प्रशासन की ओर से तमाम तरह की व्यवस्थाये दूर दराज़ से आ रहे ग़रीब और मज़दूर पेशा लोगों के लिए किए जाने का दावा किया जा रहा है, पर अगर ज़मींनी स्तर पर देखा जाए तो शायद वो सुविधा ऐसे लोगों के लिए बेहद कम हैं। आँखों में आंसू, चेहरे पर लाचारी और अपनो से मिलने की जल्दी इस तबके में आसानी से देखने को मिल रही है। लगातार चलते चलते पड़ने वाले छाले और पांव की सूजन, पेट में वक़्त पर रोटी का लुकमा ना मिलने का दर्द भी अल्फ़ाज़ों से बयां नहीं कर पा रहे हैं। सिर्फ एक ही चीज़ उनके सामने है कि किसी तरीक़े से अपने घरों तक पहुंच जाए। इसके लिए कुछ ने शासन स्तर से मदद मांगी तो कुछ ने घर आने के लिए अपने परिवार से ऑनलाइन पैसे मंगाकर साईकिल के खरीदने की बात क़ुबूल की है। लुधियाना से अयोध्या जाने वाले एक साईकिल सवार मज़दूर ने बताया कि मैंने अपने क्षेत्र के विधायक से लगातार राब्ता करने की कोशिश की पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। अयोध्या के ही बीजेपी जिला अध्यक्ष ने तो साफ कहा कि हमारी बात सरकार तक नहीं हैं। ऐसे में क्या वजूद इन लोगों का होगा जो पेट भरने के लिए, महज़ प्याज़, नमक वाली रोटी और चने लेकर सफ़र पर निकल रहे हैं। सहारनपुर तीन राज्यों की सीमाओं से सटा हुआ है, जिनमें उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब शामिल हैं। यही वजह है कि प्रवासी मज़दूर सहारनपुर शहर और देहात क्षेत्र के रास्ते से निकल रहे हैं। ज़िलें में ऐसे लोगों के लिए पिलखनी में ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था की गई है।

सहारनपुर से गुजरने पर जब इन प्रवासी मज़दूरों से उनका हाल जाने की कोशिश की जाती है तो सफ़र की पीड़ा और भूख और प्यास में उठाई मशक्कत बताते हुए आँखे आंसुओं से लबरेज़ हो जाती है। सहारनपुर में प्रवासी मज़दूरों के लिए कई जगहों पर रहने और खाने का इंतज़ाम किया गया है, इसके अलावा शासन ने पैदल सफ़र कर रहे मज़दूरों को वाहन के ज़रिए उनके मकाम तक पहुंचाने की भी व्यवस्था की हुई है। कई जगहों पर बड़े बड़े हादसों में ऐसे मज़दूर लोग जान गंवा चुके हैं। जिसके बाद से केंद्र और राज्यों की सरकारों में हड़कंप मचा हुआ है, प्रवासी मज़दूरों को होने वाली मशक्कत को कम करने के लिये सरकार ने रेलगाड़ी और बसों की सेवाएँ भी कुछ जगहों पर शुरू भी कर दी हैं। लेकिन फ़िलहाल हालात देश और राज्यों की सरकारों के काबू में आते नहीं दिख रहे हैं। जिसकी बयानगी के लिये ये भूखे-प्यासे मौसम और वक़्त की मार झेल रहे तड़पते मज़दूर काफी हैं।

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