तुम्‍हे गजल कहूँ या गीत कहूँ, हमराज कहूँ, मनमीत कहूँ
सागर की ऊँची लहरों सा, या पुरवाईया की प्रीति कहूँ।
सारी कलियाँ चटकीं मन की, ऐसा तेरा संस्‍पर्श मिला,
तू भ्रमर नहीं, पर देख मुझे कैसे अब मन की पीर सहूँ।।

मन की सब बर्फ पिघल आई, तेरे उर की जो आँच मिली,
सो गयीं व्‍यथाएँ-पीडा़एँ, तेरे नेह की कलिका जहाँ खिली।
हो रहीं कामनाएँ मुखरित, रस प्‍यार का छलका-छलका है,
बन पावन प्रेम का प्‍याला मैं तेरे अधरों के पास रहूँ।।

यह पंक्तियां हमें लखनऊ निवासी डाॅ. सुमन सुरभि द्वारा अपनी डायरी से भेजी है।