मैं रोज परास्त होता हूं, अपनों के गन्दे व्यवहारों से…
मैं रोज परास्त होता हूं, जीवने के नित नये उल्झे विचारों से…
आखिर अपने तो अपने है, देखे जिनके खुशियों के सपने है…
इन सपनों की खातिर जग से बैर लिया,
इनके सुख की खातिर अपना दुख मोल लिया…
बूढ़ा हुआ बीमार हुआ पानी दे दो, कौन कहे इन सुकुमारों से…
मैं रोज परास्त होता हूँ, अपनों के गन्दे व्यवहारों से…

जिन होठो से जीवन की ए.बी.सी.डी. सीखा, वो होठ पराये हो जाते है…
जिन हाथों ने उगली थाम के चलना सीखा, वो हम पर हाथ उठाये जाते है…
इन डूबते रिश्तों पर भी एक ही सपना, राम इन्हें बचाये दुनियां के अत्याचारों से…
मैं रोज परास्त होता हूं, अपनों के गन्दे व्यवहारों से…

खून सुखाकर पाला जिनको, पालना जिनको अपनी छांव में…
डूब रहीं है जीवन नैया, क्योंकि पानी भर आया नांव में…
अंतिम इच्छा थी, दफना देना अपने गांव में…
अब ये यही जलायेंगे, क्योंकि सहमत नहीं विचारों से…
मैं रोज परास्त होता हूं, अपनों के गन्दे व्यवहारों से…

डाॅ. अजीत सिंह (MBBS)

Director- Family Hospital, Vimla Nursing Pharmacy College, Kanpur, Uttar Pradesh