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कविताः परिणीता

तरंगें जब अनुरूप हुई, तब संगम अरु संयोग हुआ।
दो कदम बढ़ें ठिठके ठिठके, दो रूहों का तब मेल हुआ।।
दो अनजाने व्यक्तित्व मिले, समुच्चय बना विचारों का।
दो धाराएं मिल एक बनी, मेल हुआ परिवारों का।।
अनुभूति आपकी जो कुछ है, उसका तो मुझको भान नहीं।
उद्वेलन जो मन में है, उसका मुझको ज्ञान नहीं।।
अंदर में अंगीकृत करते, कुछ तो हमें बताओ भी।
अंतर मंथन क्या करते हो बातें हमे सुनाओगी।।
प्रारब्ध समुच्चय की नीयति, संसाधन प्राप्त प्रयोग करें।
मिलकर कदम बढ़ाते हैं, संस्कारों का योग करें।।
मन शुद्ध तुम्हारा गंगा सा, मुख अंतर्मन का दर्पण है।
कष्ट ब्याधि परिलक्षित होती, तब भी सेवा अर्पण है।।
प्यार तो दिल में लहरें मारे, बाहर नहीं निकलता है।
आंतरिक चोट जब लग जाये, चेहरे में दर्द उभरता है।।
उच्च विचारों का संग्रह, शालीन भाव भंगिमा है।
सेवा भाव हमेशा है, मर्यादा है गरिमा है।।
वैदेही का रूप सृजन आचरण तपस्या की बेदी।
परमार्थ स्वार्थ के अंतर को काल नियति निश्चित करती।।
देवी तुम हो श्रद्धा की, कर्म धर्म का संगम हो।
सबको स्नेह सुलभ रहता, चाहे जड़ या जंगम हो।।
सत्य मार्ग अपनाया है, मिथ्या की कोई जगह नहीं ।
प्रेम प्यार मिल जाये तो भंजन की कोई वजह नहीं ।।
गहन विचारों का सागर है, गहराई का पता नहीं।
आत्मबोध का ज्ञान सदा, परमार्थ की चिंता सता रही।।
चतुर चपल हो तीव्र बुद्धि, तुम्हीं ज्ञान की सागर हो।
दया प्रेम करना निष्ठा, संवेदन की गागर हो।।

रचियता
बृज कुमार उमराव, कानपुर

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