Home मनोरंजन कविता बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

श्रमजीवी पिपीलिका हूं,
श्रृष्टि का मैं नूर हूं।
बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

परजीवियों की जीविका की,
मैं ही तो आश हूं।
उद्यमजनों की जिजीविषा की,
मैं ही तो प्यास हूं।
हर प्यास को निज श्रमकणों से,
बुझाने को मजबूर हूं।।
बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

याद आता हूं सभी को,
बस, इक माह-मई में।
जिकर कभी मेरा हुआ ना,
’साखी’,’सबद’,’सतसई’ में।
जो श्रम सरगम राग छेड़े,
वह साज साधन संतूर हूं।।
बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

कितना मिलेगा, मिला कितना,
हैं, न कोई शिकवे गिले।
है, बन्धु! केवल कष्ट इतना,
भद्र जन जब भी मिले, फासले रखकर मिले।
फासलों के फलसफे का,
मैं श्रमजनित दस्तूर हूं।।
बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

अब तो मेरी आह! सुन लो,
बन्धु! कोई पनाह चुन लो।
डगर हमें चलने न देती,
पुकार, हे! शहंशाह सुन लो।
जतन कर दो मिलन का कुछ,
स्व -जनों से दूर हूं।।
बन्धु! मैं ’मजदूर’ हूं।

’’उदय उमराव’’


प्र०अ० प्राथमिक विद्यालय मदुरी, घाटमपुर कानपुर नगर

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🤔🤔🤔🤔ऐसा लग रहा है कि देश में सिर्फ मजदूर ही रहते हैं….बाकी क्या काजू किसमिस बघार रहे हैं ?🙁

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