Home मनोरंजन कविता गीतः मन रे! धीर धर ले

गीतः मन रे! धीर धर ले

फीकी सुबहें बोझिल दिन पसरा सन्‍नाटा है।

सहमा सहमा सा जैसे चिडि़यों का कलरव है
बच्‍चे भी हैं कैद घरों में, गलियाँ नीरव हैं
चुभा सभी के पैरों में कोरोना काँटा है।
फीकी सुबहें बोझिल दिन पसरा सन्‍नाटा है

विधवाओं की माँग सरीखी हैं सड़कें सूनी
बाहर दहशत, भीतर चुप्‍पी, मार पडी़ दूनी।
दिल दिमाग में उठता रहता ज्‍वार औ भाटा है।
फीकी सुबहें बोझिल दिन पसरा सन्‍नाटा है

मन को देते आस कि ये दिन भी बीतेंगे।
सब्र और संकल्प न टूटा तो हम जीतेंगे।
बाहर जाने की चाहत पर खुद को डाँटा है।
फीकी सुबहें, बोझिल दिन पसरा सन्‍नाटा है।

डाॅ. सुमन सुरभि,

रुचिखण्ड, लखनऊ

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