Home मनोरंजन कविता कविता: डग- मग -पग

कविता: डग- मग -पग

दीप जला ले, थाल बजवा ले, पैदल भी अब चलवा ले।
निकल पड़े हम, ले सर गठरी, ‘डग-मग-पग’ पर ले छाले।।

निज रसद पास था जब तक, हम रहे खोल के अन्दर।
फिर निकल पड़े हम पथ पर, सह भूख-प्यास का मंजर।।
आ, प्यारे कुछ रसद बांटकर, तू भी पुण्य कमा ले।
निकल पड़े हम ले सर गठरी, ‘डग-मग-पग’ पर ले छाले।।

ऐसी, कैसे हो गई तुमसे, बेपरवाह ढिठाई?
भूल गए क्या? पग धोकर, थी फोटो खूब खिंचाई।
आ,अब संग-संग चलकर मेरे, फोटो फिर खिंचवा ले।।
निकल पड़े हम ले सर गठरी, ‘डग-मग-पग’ पर ले छाले।।

दिलवाले पैदल लाए दुल्हनियां, पैसे वाले जहाजों से।
गूंज उठी पगडंडी वह, मजदूर- मर्सिया बाजों से।
आह! तुम्हें सुध भी ना आई, जननी जनम राह दे डाले।।
निकल पड़े हम ले सर गठरी, ‘डग-मग-पग’ पर ले छाले।।

उर ‘उदय’ विनय अब है करता, हे भो!पथ शीतल छांह बढ़ा दे।
ना उम्मीदी ‘शहंशाह’ से, तू ही अपनी बांह बढ़ा दे।
मनसुख-सुमन बिछा उन राहों, चुन, कंकड़ हैं, जो डाले।।
निकल पड़े वो जिन राहों पर, ‘डग-मग-पग’ पर ले छाले।।

उदय उमराव

प्र०अ० प्राथमिक विद्यालय मदुरी घाटमपुर कानपुर नगर

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