गज़ल

जिंदगी सवाल हो गई।
कैसी फटेहाल हो गई।।
सब अभाव सत्य हो गए।
दुर्दशा निहाल हो गई।।
सोच सारे स्वप्न बन गए।
उम्र रोटी दाल हो गई।।
दुश्मनी की बात छोड़िये।
दोस्ती बवाल हो गई।।
कालिमा की बात क्या करें।
रोशनी ही काल हो गई।।

चंद्र पाल सिंह ’निरंकुश’

बीघापुर, जनपद उन्नाव

Leave a Reply

Most Popular

बादल की गड़गड़ाहट

धूल भरी आंधी , गर्मी, ज्यादा ठंड ऐसे अनेक प्राकृतिक वातावरण हमें पर्यावरण में देखने को मिलते हैं लेकिन सावन ! एक...

अब पहले जैसा जहां नहीं मिलता

ढूंढने से अब पहले जैसा,, जहां नहीं मिलता,मिल जाए नजर पर अब,, दिल नहीं मिलता अपने घर...

सुख और आनंद कहां हैं!

पापा आप ऑफिस से आकर न तो कुछ खेल खेलते हो, न टी.वी देखते हो और न कई घूमने जाते हो कितनी...

विवेकहीन राजनीति

राजनीति की सीढ़ियां चढ़ तुम,परहित भूल ही गए तुम,मानस का विवेक गवांकर तुम,किस राह पर चल पड़े हो तुम।१।

Recent Comments

प्रेम शंकर चौधरी, उत्तर रेलवे लखनऊ। on महिलाओं की सोच को नई दिशा दिखाती अक्षय फाउंडेशन