जाति मजहब के नाम पर हर रोज लुटते देखा है
इस सोने की चिड़िया को हर रोज टूटते देखा है

न रहा हिंदुस्तानी कोई, न अब वो हिंदुस्तान रहा
हैं जातियों में बिखरे हुए,यहां न कोई इंसान रहा

वो एकता और अखंडता का न कोई निशान रहा
मेरे भारत महान का, अब न वो गुमान रहा

पागल थें वो दिवाने जो देश पे बलिदान हुए
मिट सी गई हस्ती उनकी, गुमनाम वो ईमान हुए

जो न करे उसे हासिल हुआ, करके वो नाकाम रहा
जो देश के टुकड़े कियें, देश उन्ही का गुलाम रहा