वो घर के चिराग, वो उजाले गये हैं
कई ख्वाब दिलों में, संभाले गये हैं
जब-जब उत्पात मचाई रावण ने
तब तब राम घर से निकाले गये हैं
अंधी मां की आंख का तारा था वो
बृध पिता का एक ही सहारा था वो
थी जो प्यार से राखी बांधती
उस बहन का दुलारा था वो
न हंसता है न रोता है
वो रातों को न सोता है
जो औरों के लिए ही जीता है
वो ही फौजी होता है
वो धीर है गम्भीर है
वो लोहे की जंजीर है
जो दुश्मन का सीना चीर दे
ऐसा वो समसीर है
है शेर की दहाड़ वो
हिमालय सा पहाड़ वो
जो गुंज उठे अंबर तलक
है ऐसी ललकार वो
है भारत की शान वो
देश का है गुमान वो
है हंसते हुए वो मिट जाता
ऐसा है बलिदान वो
वो है तो हम हैं गुलिस्तां है
ये धरती है ये हिन्दोस्तां है
हम जीते अपनों कि खातिर
वो औरों के लिए ही जीता है
ये खादीवाले क्या समझें
एक फौजी के दास्तानें को
जो चूहों की तरह कुतर रहें
अपने ही आशियानें को
सौ बार नमन है वर्णन में
बीर शहिदों कि चर्णन में

इंदर भोले नाथ बलिया (उ.प्र.)