एडवोकेट बाबू सिंह, उन्नाव

नैतिक मूल्य, नैतिक कर्तव्‍य कहाँ गुम हो गए? समाज से चरित्र का कहाँ ह्रासमान हो गया? धर्म लोगों को स्वर्ग या मोक्ष नहीं दिला पाया लोग धर्म मे अंधे होकर कट्टर होते जा रहे है दिन पर दिन झगड़े फसाद बढ़ते जा रहे है। धार्मिक लोग धर्माश्रित होकर सोचते है कि धर्म ही स्वर्ग या मोक्ष दिलाने का मार्ग है। आज के परिवेश में वैज्ञानिक सोच प्रयोगशालाओ में ही सिमट कर रह गयी है।लोग संकीर्ण हो गए है राष्ट्र धर्म और भाषा की संकीर्णतायें विश्वबन्धुत्व में बाधक हो रही है सम्पूर्ण विश्व मे जगह जगह अलग अलग धर्म है भिन्न भिन्न धार्मिक मान्यताये हैं अलग अलग कर्मकांड हैं। हर धर्म अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानता है विश्व में इसी वैचारिक मतभेद के कारण धर्म सार्वभौमिक नही हो पा रहा है धर्म मे कई विसंगतियां है कोई भी धर्मग्रंथ अपनी कमियों को स्वीकार नहीं करता पराजय स्वीकार नहीं करता हर धर्म अपने अपने लक्ष्य से बंधा है उसमें वैचारिक स्वतंत्रता का कोई स्थान नहीं है। किसी भी धर्म में वर्तमान की अपेक्षा उसमे भूतकालीन दृष्टिकोण प्रबल रहता है कि जो परम्परा सदियों से चली आ रही है वही सत्य है उसको बदला नहीं जा सकता। परन्तु नैतिकता हर ब्यक्ति से अपेक्षित होती है चाहे वह ब्यक्ति नास्तिक हो या आस्तिक किसी भी धर्म का हो किंतु नैतिकता नहीं बंट सकती धर्म और आस्थाएं बंट सकती है किंतु नैतिकता नही बंट सकती धर्म और आस्थाएं बंट सकती हैं। नैतिकता सार्वभौमिक होती है। दुनिया मे कहीं भी जाओ नैतिक मूल्य सर्वत्र एक जैसे ही मिलेंगे यदि चोरी करना अमेरिका और जापान में बुरी बात है तो भारत और इंग्लैंड में भी बुरा काम है। नैतिकता से तात्पर्य है कि मित्रवत रहो सच बोलो हिंसा मत करो संग्रह मत करो दया करो सबकी सहायता करो । यही नैतिक या मानवीय मूल्य हैं। हम लोग भूल या भ्रमवश नैतिकता को धर्म पर आधारित मान लेते है । जब कि वास्तव में नैतिकता बुद्धि और विवेक पर आधारित होती है धर्म पर नहीं । नैतिकता विलुप्त हो रही है आज धर्मांधता ज्यादा है श्रद्धाभक्ति ज्यादा है जगह जगह पर धार्मिक अनुष्ठान हो रहे है धर्मगुरुओं द्वारा अनेकानेक धार्मिक प्रवचन संचार माध्यमों से लोगों तक पहुंच रहे है फिर भी मानवीय मूल्य विलुप्त हो रहे है हर ब्यक्ति एक दूसरे को कष्ट पहुंचाकर अपने स्वार्थ सिद्धि में लगा है। यहाँ तक कि प्रवचन देने वाले स्वंयभू धर्मगुरु भी दिग्भ्रमित होकर समाज में घृणित कार्य कर रहे है।अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिए तत्पर है। स्थानाभिमान, भाषाभिमान , राष्ट्राभिमान, धर्माभिमान , आदि ऐसी संकीर्णतायें है जो विश्व बंधुत्व में बाधक है। अपनी अस्मिता बनाये रखने की होड़ ने ही सारी समस्याओं को जन्म दिया है। मनुष्य को धर्माश्रित नही विवेकाश्रित होना चाहिये। वैज्ञानिक दृष्टिकोण सबके लिए जरूरी है। क्यो कि इसमें सबके लिए एक मार्ग है और वह सबके लिए खुला है।विज्ञान सम्पूर्ण विश्व मे एक है विज्ञान में नई अवधारणाओं को सहर्ष स्वीकार करने का मार्ग सदैव खुला है। पुरानी अवधारणाये गलत साबित होने पर स्वतः ही समाप्त हो जाती है विज्ञान में तर्क की स्वतंत्रता है जब कि धर्म में नही । तर्क करने से विज्ञान का अनुशासन भंग नही होता जब कि धर्म में तर्क करने की स्वतंत्रता से मनमानी होने का भय व्‍याप्त हो जाता है। विज्ञान का उपयोग कैसे हो ? यह ब्यक्ति पर निर्भर करता है विनाश के लिए विज्ञान को दोष देना उचित नहीं है दोष साधनों का नही उपयोग करने वालो का है यह हम और आप पर निर्भर करता है कि विज्ञान का प्रयोग हम कैसे करे विनाशकारी या रक्षात्मक ? वर्तमान परिदृश्य में विश्व अशांति के पीछे जितने भी कारण है उन सबके पीछे धर्म की ही जड़ें मिलेंगी । चाहे आंशिक रूप से ही क्यों न हों। धर्म से श्रद्धा , श्रद्धा से अंधश्रद्धा और अंधश्रद्धा से कट्टरता का जन्म होता है आगे चलकर यही धार्मिक कट्टरता आतंकवाद का मार्ग बनाती है। इसलिए ब्यक्ति को धर्माश्रित होने के साथ साथ विवेकाश्रित होना भी आवश्यक है। मानव को मानवीय मूल्यों पर अमल करते हुए यथार्थवादी तर्क संगत दूरगामी सोच पैदा करनी होगी । इस कार्य को विचारक, वैज्ञानिक, शिक्षक, समाज सेवी राजनेताओ, साहित्यकारों, व पत्रकारों को मिलकर धर्म को तर्कसंगत बनाना होगा तभी विश्व शांति की अपेक्षा की जा सकती है।