गंगा जी के पावन जल सा,कहाँ गया बचपन।
ईश्वर की छवि जिसमें झलके,कहाँ गया दर्पन।
अपने और पराये का था,जिसमें भेद नहीं-
कोरे कागज जैसा निर्मल,कहाँ गया वह मन।

तितली बन फूलों सँग खेले,वह नटखट बचपन।
एक मिनट में करे दोस्ती दूजे पल अनबन।
निश्छल औ’ निस्वार्थ निष्कपट,द्वेष रहित रहना-
काश! मुझे फिरसे मिल जाये,वह बीता जीवन।

श्याम सुन्दर श्रीवास्तव ‘कोमल’
लहार,भिण्ड,म०प्र०