सावन का पवित्र माह चल रहा है और इस दौरान भगवान शंकर की पूजा करना महत्वपूर्ण होती है, आज आपको बताते है कि भगवान शंकर को पाने के लिए पार्वती जी ने किन-किन परीक्षाओं का सामना किया था।

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पार्वती जी ने शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तप आरम्भ किया उनके इस अति विलक्षण तप और अर्चना को देख कर समस्त देवता गण भी आश्चर्य में पड़ गए उन्होंने यह बात शिव जी से बताई तो शिव जी ने कहा मुझे ज्ञात है की पार्वती मेरी उपासना कर रही है आप लोग सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेज दीजिये ,सप्तऋषियों ने  पार्वती के पास जाकर शिव जी के अनेक अवगुण बताये किन्तु पार्वती उनकी बातो से बिलकुल भी विचलित नहीं हुई और निरंतर अपने तप में ध्यान मग्न रही तब सप्तऋषियों ने सारी बात शिव जी को बतायी तो शिव जी ने पार्वती जी की परीक्षा लेने का विचार किया ।जिस स्थान पर पार्वती जी तप कर रही थी वहां एक बड़ा समुन्द्र का स्रोत था,अचानक पार्वती जी को किसी बालक का क्रंदन सुनाई दिया ,उन्होंने देखा की एक विशाल मगरमच्छ ने एक बालक को पकड़ लिया है और उसे निगलने जा रहा है पार्वती जी ने मगरमच्छ  से उस बालक को छोड़ने का आग्रह किया तो मगरमच्छ ने कहा की देवताओं ने दिन के छठवे पहर में इस बालक को मेरे आहार के रूप में भेजा है अतः यह मेरा भोजन है ,तब पार्वती जी ने कहा तुम इस बालक को मुक्त कर दो और जो चाहो मांग लो,तब मगरमच्छ ने कहा ठीक है जो तप आप कर रही है उसका फल मुझे चाहिए ,तो पार्वती जी ने कहा मैं इस बालक प्राणों के बदले में अपने तप का फल सहर्ष तुम्हे देने को तैयार हूँ सर्वप्रथम इस बालक के जीवन की रक्षा मेरे लिये सर्वोपरि है तब मगरमच्छ ने कहा ‘एक बार फिर से विचार कर लो अगर तप का फल मुझे दे दिया तो आपने हज़ारों वर्षो तक जो तपस्या की है उसका कोई मोल नहीं रह जायेगा और तुम्हे फिर से आराधना प्रारम्भ करनी पड़ेंगी, तब पार्वती जी ने उत्तर दिया की ‘इस समय मेरी हर प्रार्थना और हर उपासना से बढ़कर इस बालक को जीवन दान देना है मैं फिर से अपने आराध्य के लिए तब तक कठिन से कठिन तप करुँगी जब तक शिव जी मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर लेते। पार्वती जी के इतना कहते ही मगरमच्छ और बालक अदृश्य हो गए और भगवान् शंकर साक्षात् प्रकट हो गए ,शिव ने कहा पार्वती मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ इतने वर्षो की तपस्या के भंग होने और नष्ट होने का  भी तुमने  कोई  विचार नहीं किया और उस बालक के प्राणों की रक्षा को अपना सर्वप्रथम कर्त्तव्य समझा, वो मगरमच्छ और वो बालक भी मैं ही था,केवल तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने ये रूप धरा था ,तुम तप करने वाली सभी स्त्रियों में सर्वश्रेठ हो ‘मैं तुम्हे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ।और फिर शिवरात्रि के पावन पर्व पर शिव और पार्वती का विवाह अत्यंत धूम धाम से सम्पन्न हो गया।

लेखक- सुनीत भटनागर, कानपुर 6394743484