एक समय की बात है भगवान् शंकर का एक भक्त प्रतिदिन सुबह उठकर अपने नित्य कार्य से निवर्त होकर शिव जी पूजा करने निकट के मंदिर में जाया करता था और प्रतिदिन शिव लिंग पर बेलपत्र अर्पित किया करता था उसके घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी अनेक कठिनाइयों के साथ उसका जीवन यापन हो रहा था परंतु इसके पश्चात् भी उसका दानी स्वाभाव नहीं गया था वो किसी न किसी तरह से दुसरो की सहायता करता रहता था उसकी पत्नी उसके इस कार्य से दुखी रहती थी किन्तु उसकी शिव आराधना से उससे अत्यधिक प्रेम भी करती थी एक समय ऐसा भी आया जब मंदिर में दान दक्षिणा कम आने लगा तो उस भक्त की आर्थिक समस्या और भी गहरी हो गयी एक दिन शिव पार्वती उसी मंदिर के निकट से गुज़र रहे थे तो उन्होंने देखा की वो शिव भक्त पूजा कर रहा था उसको दयनीय अवस्था में देखकर पार्वती जी ने शिव जी से कहा की आपका ये परम भक्त कितने भक्ति भाव से आपकी आराधना कर रहा है किन्तु इसकी आर्थिक अवस्था अत्यंत जर्जर है आप कृपया इसकी मदद करे तब शिव जी ने कहा की मेरे इस भक्त ने अभी तक जितने भी बेलपत्र मुझे अर्पण किये है और भविष्य में जितने भी बेलपत्र मुझे अर्पण करेगा उतनी ही स्वर्ण मुद्राए इसे मिलेंगी और इसकी गरीबी सदैव के लिए समाप्त हो जायेगी शिव पार्वती की बात वहां पर एक सेठ भी छुपकर सुन रहा था उसने सोचा की अगर वो बेलपत्र मुझे मिल जाये तो मैं और भी धनी बन जाऊंगा ये सोचकर वो सेठ उस भक्त के घर जा पंहुचा और उसने सभी बेलपत्र के बदले उतनी ही स्वर्ण मुद्राए देने को कहा तो भक्त ने ये बात अपनी पत्नी से कही तब उसकी पत्नी ने कहा की शायद भगवान् शिव ने ही हमें गरीबी से छुटकारा दिलाने के लिए ही इस सेठ को यहाँ भेज दिया है और फिर उस भक्त ने बोरे में भर कर रखे हुए सारे बेलपत्र उतनी ही स्वर्ण मुद्राए के बदले दे दिए सेठ वो सारे बेलपत्र लेकर मंदिर पहुंच गया और सभी बेलपत्र को शिव लिंग पर चढ़ाकर उनके स्वर्ण मुद्राओं में परिवर्तित होने का इंतज़ार करने लगा जब रात का तीसरा पहर ख़त्म होने लगा तो उस सेठ के सब्र का बाँध टूट गया और वो शिवलिंग को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से शोर मचाने लगा और उसके दोनों हाथ शिव लिंग से कठोरता से चिपक गए उस सेठ ने अपने हाथों को छुड़ाने की भरसक चेष्टा की परंतु वो सफल नहीं हो पाया आखिर में वो शिव जी से क्षमा मांगने लगा उसी समय वहां पर शंकर पार्वती प्रकट हो गए और शिव जी उस सेठ से कहा की तुमने लालच में आकर उस गरीब भक्त से उसका अधिकार छीना इसी कारणवश तुमको ये दंड मिला है अब तुमने जितने भी बेलपत्र चढ़ाए है उतनी ही स्वर्ण मुद्राओं को लाकर इस भक्त को देनी होगी इसके बाद तुम मुक्त हो सकते हो फिर उस सेठ ने तुरंत अपने घर सन्देश भेज कर सवर्ण मुद्राए मंगवा कर उस शिव भक्त को दी और अपने अनुचित कार्य की क्षमा भी मांगी फिर उसके हाथ शिव लिंग से मुक्त हो गए फिर शिव जी ने पार्वती से कहा की मैं धन नहीं देता केवल मार्ग दिखता हूँ यही मार्ग मनुष्य को उचित और अनुचित की शिक्षा देता है फिर शिव पार्वती ने अपने भक्त और उसकी पत्नी को आर्शीवाद दिया और अपने लोक चले गए।

सुनीत भटनागर, कानपुर