BY- संजय कुमार बिश्नोई साँचौर

भूख के कारण लोग पहले से ही बहुत जान गवां चुके हैं 1956 में पड़ा अकाल आज भी छप्पनीया अकाल के नाम से लोगों की रूह कंपकंपा देता है। उसमें जो प्रकृति का प्रकोप था। वह एक उदाहरण था उन लोगों के लिए जो पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करते हैं। उस समय बरसात नहीं होने के कारण लोगों ने पेड़ के पत्ते खाकर जीवन जीने का प्रयास किया था। लेकिन अबकी बार तो पेड़ के पत्ते भी नसीब नहीं होने वाले हैं। क्योंकि फसल के साथ-साथ टिड्डी दल पेड़ पौधों को भी भारी नुकसान पहुंचा रहे है ।

पहले केवल गरीब किसान इस भुखमरी के चपेट में आए थे। लेकिन अब मनुष्य की गुस्ताखी का फल हर व्यक्ति को प्रभावित करेगा। टिड्डी दल जो राजस्थान, यूपी, मध्यप्रदेश व अन्य राज्यों में फसलों को नुकसान पहुंचा रहा है। इसके अलावा भी कई देशों में नुकसान पहुंचा चुका है। एक सर्वे के मुताबिक अगर टिड्डी दल का आक्रमण यूं ही चलता रहा तो पृथ्वी के विभिन्न देशों में जा रहे अनाज में भारी गिरावट आ सकती है ।

टिड्डी दल की समस्या केवल भारत में ही नहीं है बल्कि अन्य अन्य देशों पर भी हैं। हम समस्या कोई भी हो समस्या का नाम लेते ही उसके कारण पर हमारा ध्यान जरूर आकर्षित होता हैं। समस्या का कारण मुख्य तौर पर यही हैं कि मनुष्य द पारिस्थितिकी तंत्र के साथ छेड़छाड़ बहुत अधिक कर रहा हैं । बात बिल्कुल तय है कि लोगों ने टिड्डी दल के कीड़ों को खाने वाले पशु पक्षियों को लुप्त कर दिया है । दरअसल टिड्डी के रहने का मूल स्थान पहाड़ी क्षेत्र माना जाता है और वहां पर एसे जीव विद्यमान थे जो टिड्डी की संख्या में कमी लाते थे । और टिड्डी इतनी मात्रा में नहीं पैदा हो पाती थी ।

इस विपत्ति के कारण विश्व को बड़ी खाद्य सामग्री की समस्या का सामना करना पड़ेगा । इससे पहले भी बड़ा नुकसान देश के किसानों को उठाना पड़ चुका है। जब 4 महीने पहले टिड्डी दल ने राजस्थान व गुजरात में जीरा व सरसों के साथ और भी अनेक फसलों को नुकसान पहुंचाया था। उसे बीती बात कह कर टाल देना उपयुक्त नहीं हैं क्योंकि वह नुकसान तो सिर्फ उदाहरण साबित होने वाला है इससे कई गुना ज्यादा नुकसान आगे देखने को मिल सकता है इस समस्या का समाधान केवल थाली या ढोल बजाने से नहीं होने वाला है। इसके लिए सरकार व w.h.o. की सहभागिता जरूरी है। लेकिन इस समस्या को कुछ समय के लिए दबा कर रख सकते हैं। पर पूर्ण रूप से समाप्त नहीं कर सकते। इसके लिए मनुष्य को पर्यावरण को चलाने में अहम भूमिका निभाने वाली पारिस्थितिकी तंत्र के साथ छेड़छाड़ ना करने का अहम कदम उठाना पङेगा । लेकिन फ़िलहाल इस वैश्विक भुखमरी से निपटने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।