लेखक – संजय कुमार बिश्नोई साँचौर

बेमौसम बरसात का, आनंद लेते कई लोग।
पर कुछ बूंद उसके ,आँखो से गिर रही ।।
आजमाने को कोई ओर नहीं, ऊपर वाले के पास।
जैसे सदियों से परम्परा, चली आ रही ।।
कुछ बूंद उसके आँखो से…….
मानता है फसल को, अपनी संतान जो।
आज उसकी औलाद, तैरती जा रही।।
इस क्षेत्र की खेर, बात ही छोड़ो लेकिन ।
लगता है इन्द्र सरकार ही, तानाशाही पर चल रही ।।
कुछ बूंद उसके आँखो से ………
फसल ही भगवान, थी उसके लिए ।
आज उसकी आस्था, बरसात में भीग रही।।
गौर कोई करे ना करे, उसकी बातो पर ।
आज तक सांसारिक शांति के साथ, पेट की भी शांति जरूरी रही।।
कुछ बूंद उसकी आंखो से……