By- सुरेंद्र सैनी बवानीवाल “उड़ता”

जैसा की हम सभी जानते हैं की 01 अगस्त को बकरा-ईद मनायी जाएगी, क़ुरबानी एक अज़ीम रुतबा है, क़ुरबानी में सुकून है. बकरा-ईद के दिन को हम कुर्बानी का दिन मानते हैं.और हर गुंबद के अंदर कुर्बानी का एक तरीका और अदायत रही है. कुर्बानी इसलिए दी जाती है ताकि अल्लाह-ताला का तक़र्रूब हासिल किया जा सके. खुदा का बंदा अल्लाह के करीब हो सके. अल्लाह की आज़मत, उसकी  मोहब्बत और वकार ले सके और खुदा के दिल में बैठ सके. ताकि तुम अल्लाह का नाम ज़िबाह करने के वक़्त ले सको. यानि की जब किसी जानवर को ज़िबह किया जाता है तो बिस्मिल्लाह-हू-अल्लाह-हू-अकबर. इसका मतलब अल्लाह की बड़ाई की जाती है. अल्लाह की तारीफ की जाती है. और बंदा इस बात का सबूत देता है की मेरा किया हर काम अल्लाह के लिए है. ऐसे मौके पर जब किसी जानवर की गर्दन पर छुरी फेरी जाती है तो उसकी क़ुरबानी अल्लाह के लिए समझी जाती है और ये भी समझा जाता है की अल्लाह के हर बन्दे को कुर्बानी देनी चाहिए और क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए. 

इंसान की कुर्बानी क्या है? 

इस सवाल का जवाब है की इंसान अपनी सारी  ख्वाहिशात, तमाम जज़्बात आज अपने अल्लाह के लिए कुर्बान करता हूं.इन सबसे यक़ीनन मेरी नमाज,मेरी कुर्बानी, मेरा जीना, मेरा मरना सब अल्लाह-रहीम के लिए है. अगर हम सब इस नियत के साथ अपनी सभी कुर्बानियां करेंगे तो हमारी ज़िन्दगी की सभी परेशानियां, फसाद और  खराबीयाँ दूर हों जाएंगी और हमें सुकून मिलेगा. ऐसा होगा क्योंकि ऐसे पाक मौके पर हमने अपने जज़्बातों को, अपनी ख्वाहिशों को भी कुर्बान कर दिया है.क़ुरबानी एक बहुत अज़ीम चीज़ है. इसलिए इसे खुदा ने कुरान-ए-करीम के अंदर इसे दीन-ए-इस्लाम की बड़ी अलामतों में बताया है. क़ुरबानी का यह मतलब कतई नहीं की तुम जानवर का गला जिबह करके उसका गोश्त खा जाओ. अल्लाह-ताला तुम्हें बहुत सवाब – अताह फरमाएंगे. तुमने जो जानवर जिबह किया है उससे फाहनीर को भी खिलाओ और मोहतीर को भी खिलाओ. फाहनीर तो वो शक़्स है जो मज़बूर है, फ़क़ीर है, गरीब है या ऐसा कोई जिसका ज़मीर और गैरत  उसे किसी के आगे सवाल करने की या हाथ फैलाकर मांगने  की इज़ाज़त नहीं देता. जो कहीं मांगने नहीं जाता और अपनी ही जगह बैठा रहता है.ऐसे लोगों को ढूंढ़कर उसे ज़िबह किए हुए जानवर का गोश्त खिलाओ.और मोहतर वो शक़्स होता है जो सवाल करता है. सवाल करने का मतलब यह है की या तो वो ज़ुबान से सवाल करता हों या अपने हाल से सवाल करता हो.ज़ुबान से सवाल करने को तो सभी समझते हैं की वो मुँह से कह रहा है की मुझे भी खाने के लिए गोश्त दो. और दूसरा वो जिसके नाजुक हालात बता रहे हों की वह कुछ चाहता है. ऐसे इंसान को भी कभी दुत्कारें नहीं. जैसे की क्यों वो बार बार वहाँ चक्कर लगा रहा है या उधर घूम रहा है.ऐसे शख्स को भी दे देना चाहिए. अल्लाह फरमाते हैं की मेरी मेहर समझ की तेरी गिरफ्त में कैंसे -कैसे जानवर आ रहे हैं. अगर तू खुद से चाहे तो ऐसा नहीं हों सकता. अल्लाह-ताला ने उन जानवरों को तुम्हारे लिए मुसक्कर कर दिया वर्ना ऊँट जैसे जानवर को काबू करना आसान नहीं होता. ऊँट चाहे तो दस आदमियों को खींच कर कहीं भी ले जाए. ऊँट में इतनी ताकत होती है. लेकिन अल्लाह-ताला ने एक इंसान के हवाले कर दिया उसको.इसमें इंसान का कोई कमाल नहीं है.बस अल्लाह का शुक्रिया अदा करो.अल्लाह फरमाते हैं की उन तक उस जानवर का ना तो खून पहुँचता है और ना ही गोश्त पहुँचता है. बल्कि तुम्हारा तक्वा अल्लाह-ताला तक पहुँचता है. जिस तरीके से अल्लाह-ताला ने हुक्म किया है उसी तरह से तुमने उस जानवर को जिबह किया है. ऐसे मौके पर जैसे तुम्हारे ज़ज्बात रहे तुमने पूरी शिद्दत और वफादारी  से अल्लाह-ताला के हुक्म का पालन किया या हुकमदारी की .अल्लाह-ताला ने ख़ुश होकर तुझे जानवर बक्शा.तुम अल्लाह-ताला की बड़ाई करो क्योंकि अल्लाह-ताला ने तुम्हारी रहनुमाई की और कहा की ऐसे शख्स को बशाहरत हासिल हों. अल्लाह-ताला तुमसे ख़ुश हो गया की तुमने हर काम अल्लाह के हुक्म के मुताबिक किया है. 

बकरा-ईद पर मुकाबले 

इसी दिन कुछ मुकाबले भी शुरू हो जाते हैं. ये मुकाबले किसी खेल के नहीं हैं बल्कि इस बात के हैं की मेरा पड़ौसी इतना अच्छा जानवर खरीद कर लाया है तो मुझे भी उससे अच्छा जानवर खरीद कर लाना है बेशक मेरी जेब मुझे ऐसा करने की  इज़ाज़त दे या ना दे. मुझे किसी से कर्ज़ा लेना पड़े या ना पड़े मैं जरूर लेकर आऊंगा. हालांकि ये सरासर गलत बात है ऐसा नहीं होना चाहिए.इसे इसराफ कहा गया है. यहाँ हर शक़्स के लिए अलग-अलग इसराफ़ होता है क्योंकि मालदार या अमीर भी कई प्रकार के होते हैं एक आला दर्जे के मालदार दूजे दरमियानी दर्जे के मालदार होते हैं तो तीसरे कम दर्जे के मालदार होते हैं. आला दर्जे के मालदार आमतौर पर करोड़पति या अरबपति होते हैं और ये दस से पंद्रह-बीस  लाख का जानवर खरीदते हैं. इनके लिए इसराफ़ का कोई मूल्य नहीं है. अब अगर कोई दरमियानी मालदार इनकी बराबरी करने की सोचे बेशक़ उन्हें कहीं से कर्ज़ा लेना पड़े तो इनके लिए इसराफ़ कहलाता है. सच्चा उसूल तो ये है की आप अपनी जेब को देखें की अल्लाह-ताला ने आपको कितनी गुंजाईश दी है उसके हिसाब से अच्छा सा जानवर खरीदें और किसी दूसरे को देखकर ना चलें. और देखें की जानवर मोहताज़ ना हो, जानवर में कोई कमी या कोई ऐब ना हों जैसे जानवर अंधा, लंगड़ा  ना हों. जानवर का जड़ से सींग ना टुटा हुआ हो. अगर जानवर का सींग ऊपर से टुटा हुआ है तो कुर्बानी हो सकती है.आजकल अपने शहरों में बकरों को लाने का रिवाज चल पड़ा है. तो एक साल का बकरा जायज़ है. एक साल से  छोटा बकरा कुर्बानी के लिए जायज़ नहीं है. अगर बकरे के मुँह में दो दाँत है तो ये सिर्फ अनामत के तौर पर है.बकरे के  दो दाँत से ज्यादा एक साल का होना जरूरी है. दुम्बे के नियमानुसार छ: महीने के जानवर भी लिए जा सकते हैं. ऊँट कम से कम पांच साल का हों और कोई बड़ा जानवर कम से कम दो  साल का हो और उसमें जरुरी बात की वो मोहताज़ ना हो या कोई ऐब ना हो. आजकल लोग कस्सी बकरों में भी ऐब बताते हैं जो की गलत बात है. अगर पैदाइशी कस्सी है तो उसकी कुर्बानी नहीं हो सकती. लेकिन अगर उसके जन्म के बाद कस्सी किया गया है तो कुर्बानी दी जा सकती है. अतः हर इस्लाम को मानने वाले शक़्स को क़ुरबानी देनी चाहिए.  मेरी सब ख्वाहिश, मेरी नमाज, मेरा जीना, मेरा मरना सब मेरे अल्लाह-ताला के लिए है.और अल्लाह सबपर अताह फरमाए. 

ये लेखक के निजी विचार हैं।आजक्याका इससे सहमत अथवा असहमत होना आवश्यक नहीं है।)