By Suneet Bhatnagar Kanpur

रक्षाबंधन आ गया है इस पावन अवसर पर बहने सूंदर वस्त्र धारण करके हाथों में मेहँदी रचा कर भाइयों को राखी बांधती है कहने को तो ये मात्र एक धागा भर ही है लेकिन इसके मूल्य के सामने  दुनियां भर की दौलत का कोई भी महत्त्व नहीं । रक्षाबंधन की परम्परा लाखों वर्ष पुरानी है इस त्यौहार के इतिहास में अनेकों कहानियां प्रचलित है सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु ने बाली की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा तो बाली ने विष्णु जी से दानव लोक में चल कर रहने को कहा तब विष्णु जी ने बाली का आग्रह स्वीकार कर लिया और बाली के साथ रहने लगे ।विष्णु जी के दानव लोक में रहने से उनकी पत्नी लक्ष्मी अत्यंत दुखी रहने लगी उन्होंने विष्णु जी से वापस देव लोक में आने को कहा परंतु विष्णु जी ने कहा की वो बाली को दिए गए अपने वचन से बंधे है अब ये बाली पर निर्भर है की वह मुझे इस वचन से मुक्त करे ,इसके पश्चात् लक्ष्मी जी ने बाली के पास एक रक्षा सूत्र भेजा और अत्यंत मार्मिक प्रार्थना की जिसके बाद बाली ने उस रक्षा सूत्र को एक बहन की ऒर से एक भाई को दिया गया  ममस्पर्शी सन्देश मान कर भगवान विष्णु को वापस लक्ष्मी जी के पास देव लोक भेज दिया ,इस दिन के पश्चात् ही रक्षाबंधन के पर्व की परम्परा आरम्भ हो गयी।

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एक और अत्यधिक प्रचलित कहानी के अनुसार चित्तौड़ के राजा की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कर्णावती ने अपने राज्य को मुगलों के शासक बहादुर शाह ज़फर के आक्रमण से बचाने के लिए एक दूसरे मुग़ल राजा हुमांयू को धागे और कपड़े से बना रक्षा सूत्र भेज कर सन्देश दिया की एक बहन अपने भाई से अपने मान सम्मान और प्रजा की रक्षा के लिए विनती करती है फिर हुमांयू ने कर्णावती को उसकी रक्षा का वचन पूरा करने का निश्चय किया और अपनी सेना के साथ चित्तौड़  की और कूच किया किन्तु  वह समय से पहुँच नहीं सका क्योंकि तब तक ज़फर की सेना ने चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर लिया था और कर्णावती और किले की दूसरी महिलाओं ने अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए जलती अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए थे हुमांयू इस बात से बहुत दुखी था वह समय पर पहुँच कर अपनी बहन की रक्षा नहीं कर सका जहाँ कर्णावती ने जलकर अपने प्राण दिए थे उस स्थान पर पड़ी राख को आदर से प्रणाम किया और देर से आने की क्षमा मांगी।आज भी लोग भाई बहन के प्रेम की उस पावन घटना को याद करते है और तब से ही रक्षाबंधन की अनूठी परम्परा निर्बाध चली आ रही है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला ये पवित्र त्योहार सावन महीने के अंतिम दिन आता है आज आधुनिक युग में अनेक संसाधन होने के बाद भी जो भाई बहन इस दिन नहीं मिल पाते वो अनेको माध्यम से एक दूसरे से बात करके इस पवित्र पर्व   को अपने मनाते है।आप सबको रक्षाबंधन की बहुत बहुत  शुभकामनाये।