सनम की ईताबी नज़र सवालात
करम है इश्क़ जवाबी बयानात

नाराज़गी का अपना अलग मज़ा
दबाते हो लब ये कैसे ख़्यालात

उलझे से रहते हो शहर बदलकर
बस कूचा ही बदला नहीं जज़्बात

सुकून की कोई किलाबंदी नहीं
खुद करो इज़ाफ़ा बदलो हालात

समय की चाल हम-तुम से आगे
अँधेरा हो चला बदले दिन-रात

“उड़ता”तनिष्क बिना जवाहरात
देखो नया – नया है ये जमानात

द्वारा – सुरेंद्र सैनी बवानीवाल “उड़ता”
झज्जर – 124103 (हरियाणा )