By: सुरेंद्र सैनी बवानीवाल “उड़ता”

हम सभी सनातन धर्म से सम्बन्ध रखते हैं और श्री कृष्ण में हमारी पूरी आस्था है. जैसा की हम जानते हैं कि आने वाली 12.अगस्त.2020 (बुधवार) को जन्माष्टमी है और जन्माष्टमी के आगमन से पहले ही उसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती है .तो  आइये जानते हैं की जन्माष्टमी क्यों मनायी जाती है और कैसे?

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पूरे भारतवर्ष में जन्माष्टमी का उत्साह देखने योग्य होता है. चारों तरफ का वातावरण कृष्णमयी हो जाता है और श्री कृष्ण के ही भक्ति-रंग में सरोबार हो  जाता है. यह पर्व देश और विदेशों में  पूर्ण आस्था, उल्लास और निष्ठा से मनाया जाता है. प्राचीन धर्म-ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापियों के पाप से मुक्ति दिलाने के लिए और कंस का वध करने के लिए  श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया था.भगवान ने  स्वयं इस दिन पृथ्वी पर जन्म लिया था इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. पुराणों के अनुसार  भादप्रद माह की श्रावण कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्र-रूप में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था. हमेशा से जन्माष्टमी का त्यौहार विभिन्न रूपों से मनाया जाता है. कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों के  रस व इत्र का उत्सव होता है तो कहीं दही-हांडी तोड़ने का जोश दिखाई देता  है.दही हांडी के आयोजन में दही की हांडी तोड़ने वाले को इनाम भी दिया जाता है. भक्तजन श्री कृष्ण की मूर्ति और वेशभूषा भी खरीदते हैं.  इस दिन कृष्ण -झांकियां सुंदरता से  सजाकर  निकाली जाती है जिनमें भगवान कृष्ण के जीवन की मोहक छवियाँ देखने को मिलती है जिन्हें कृष्ण-लीला का नाम भी दिया जाता है. मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है. सभी कृष्ण-भक्त  चाँद निकलने तक (करीब मध्यरात्रि बारह बजे के बाद तक )व्रत और उपवास का कड़ा पालन करते हैं.मंत्रोचारण करते हुए जागने से इंसान की मोह-माया से आसक्ति हटती है. श्री कृष्ण जन्माष्टमी को मोर-रात्रि भी कहा जाता है. इस दिन श्री कृष्ण को झूला भी झुलाया जाता है और कृष्ण रासलीलाओं का भी आयोजन किया जाता है. जन्माष्टमी के शुभ दिन पर  श्री कृष्ण के दर्शन के लिए दूर – दूर से श्रद्धालु चलकर मथुरा की पावन धरती पर पहुँचते हैं. मथुरा के मंदिरों को जोर – शौर से रंग-बिरंगी चमकती लाइटों और फुलझड़ियों से कुछ दिन पहले से ही सजा दिया  जाता है.मथुरा में आयोजित होने वाले श्री कृष्ण जन्मोत्सव को देखने के लिए लाखों लोग पहुँचते हैं जिनमें देश के विभिन्न कोनों से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु होते  हैं. भगवान के विग्रह पर फूल, गुलाबजल, हल्दी, दही, घी, माखन, केसर, कपूर ये सब चढ़ाकर लोग एक-दूसरे पर उसका छिड़काव करते हैं. सारा वातावरण मनभावन महक से भर जाता है. 

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जन्माष्टमी के व्रत की विधि….. 

शास्त्रों के अनुसार इस दिन भक्तों द्वारा जन्माष्टमी के व्रत का पालन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. यह व्रत मानवीय इच्छाओं व मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है. जन्माष्टमी के उपवास में भक्त तो दिन के मध्य में एक बार जल ग्रहण करना होता है और चाँद निकल जाने के बाद फलाहार और चरणामृत लेना होता है. यह एक कठिन प्रक्रिया है लेकिन श्री कृष्ण के भक्त ऐसा आसानी से कर लेते हैं. श्री कृष्ण  की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण-भक्ति से परिपूर्ण कर देता है. यह व्रत सनातन धर्मावलियों के लिए अनिवार्य माना जाता है. इस दिन उपवास रखें जाते हैं और श्री कृष्ण के गीतों-भजनों का श्रवण किया जाता है. घर के पूजा-ग्रह में श्री कृष्ण की झांकी सजायी जाती है. जन्माष्टमी के दिन प्रातःकाल उठकर अपने नित्यक्रमों से निवृत होकर पवित्र नदियों में, पोखरों में या घर पर स्नान आदि करके जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लिया जाता है और गंगाजल से माता देवकी और श्री कृष्ण की सोने, चाँदी, ताम्बा, पीतल या मिट्टी की मूर्ति (जैसी भी आपके पास हो )को साफ कर और नए वस्त्र धारण करवाकर श्री कृष्ण के लिए लाए गए झूले – पालने में स्थापित किया जाता है.बाल गोपाल की मूर्ति को पालने में बैठाया जाता है.  इसके पश्चात 16 उपचारों से श्री कृष्ण पूजन किया जाता है. पूजन में देवकी, वासुदेव, नन्द, बलदेव, यशोदा तथा लक्ष्मी आदि के नामो का उच्चारण करते हैं व उनकी मूर्तियां भी स्थापित करके उनकी पूजा करते हैं. 

रात को चाँद निकालने के बाद अर्क देकर व जल चढ़ाकर उपवास खोल लिया जाता है. 

Surender Saini UDTA