BY: डॉ.संतोष वर्मा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष – युवा जदयू यूपी

“भारत के आदिवासी हजारों वर्षों से इस देश के सबसे पुराने निवासी हैं। बाद में यहां आने वाले समूह ने आदिवासियों को दबा कर रखा है, इनकी जमीन छीन ली, उन्हें पर्वतों वह जंगलों में खदेड़ा और उन्हें उत्पीड़न को ने अपने हित में बेगार करने को विवश किया। आज विभिन्न समूह के लगभग 4 करोड़ आदिवासी हैं (अब करीब 10 करोड़) जिन पर सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है चूँकि वह राष्ट्रीय संस्कृति से अलग-थलग रह रहे हैं। “

हकीकत में देखें तो आदिवासियों का इतिहास बाहरी आक्रांता-घुसपैठियों के दल-दमन और शोषण, अत्याचार अन्याय व स्वयं के श्रम-संघर्ष-शहादत से भरा पड़ा है। ऐसी ही परिस्थितियों में यह लोग आज भी अभाव व असुविधाओं भरी जिंदगी जी रहे हैं। जल जंगल जमीन के लिए आदिवासियों ने संपूर्ण जीवन संघर्ष किया हैं।

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मीडिया की भूमिका

इस विषय पर चर्चा की जाती है तो पहला सवाल यह उठता है कि मुख्यधारा के जनसंचार माध्यम अर्थात मास मीडिया में आदिवासियों को कितना स्पेस दिया जाता रहा है? इस सवाल का जवाब तलाश करते वक्त यह मुद्दा भी सामने आता है कि उस दिए गए स्पेस में आदिवासियों के प्रति मीडिया का दृष्टिकोण कहां तक यथार्थ के निकट है? दूसरा सवाल यह उठता है कि आदिवासियों का अपना मीडिया कहां तक विकसित हुआ है चाहे उस मीडिया में योगदान देने वाले व्यक्ति आदिवासी समुदाय के सदस्यों या आदिवासी जीवन में रुचि रखने वाले गैर आदिवासी लोग? इस क्षेत्र में जनसंचार के सभी माध्यमों को शामिल माना गया है जिसमें प्रिंट मीडिया अर्थात समाचार पत्र एवं सर्वाधिक या नियत कालीन पत्रिकाएं शामिल है जो वितरण क्रिए के स्तर पर सीमित प्रतिबंधित ना होकर जन सामान्य के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दूरदर्शन सिनेमा एवं एक सीमा तक ब्लॉक ट्विटर ऑरकुट फेसबुक वेबसाइट एवं अन्य सामग्री शामिल होगी।
जब हम संचार माध्यमों में आदिवासियों की बात करेंगे तो यह भी देखना होगा कि आदिवासी समाज के बुद्धिजीवी व मीडिया कर्मियों का मुख्यधारा के मीडिया में सीधा हस्तक्षेप कितना है अर्थात मीडिया मैनेजमेंट हुआ संवाददाता इसका कितना प्रतिनिधित्व करते हैं उस सवालों के उत्तर ढूंढने से पहले इस सच्चाई के निकट जाना जरूरी है कि आखिर मास मीडिया में आम आदमी को कितना स्थान दिया जाता रहा है पत्र-पत्रिकाओं के स्तर पर हमारे देश की प्रेस की परंपरा करीब 2 शताब्दी पुरानी है जिसका सक्रिय कालखंड आजादी की लड़ाई को माना जा सकता है। आजादी की लड़ाई निसंदेह हिंदुस्तान की आवाज की लड़ाई थी इसलिए मीडिया में स्वतंत्रता सेनानी व अन्य नायकों के साथ जन प्रतिरोधों एवं अन्य क्रांति चरणों को स्थान दिया गया आजादी के बाद हिंदुस्तान के राजनीतिक नेतृत्व पर पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं श्रीमती इंदिरा गांधी के शासन काल में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव था इसके साथ ही जनवादी व प्रगतिशील वामपंथी बुद्धिजीवियों का खासा असर बौद्धिक जगत में रहा था इसका पश्चात वर्ती प्रभाव 80 के दशक तक देखा जा सकता है उससे पहले 70 के दशक तक यह पुरजोर दशा में था वामपंथी आंदोलन भी इसी समय अवधि में सामने आए थे मीडिया में आम आदमी को इस कदर दिए गए स्पेस को देखते हुए जब आदिवासियों की बात सामने आती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति दिखाई देती है आजादी की लड़ाई में 1770 – 71 के पहाड़ियों विद्रोह से 1947 तक नागा रानी गाइदिनल्यू के संघर्ष तक भारत के विभिन्न आदिवासियों क्षेत्रों में हुए विद्रोह को इतिहास के साथ तत्कालीन मीडिया यथा पत्र-पत्रिकाओं में कोई स्थान नहीं दिया गया आजादी के बाद भी नक्सलवाद जैसे मुद्दों के अलावा मीडिया में अगर आदिवासियों को अभिव्यक्त किया है तो बताओ फैशन या अमूर्त रोमांटिक दृष्टिकोण अपनाते हुए किया गया है आदिवासी जीवन का यथार्थ अपेक्षित स्थान के साथ मीडिया में नहीं दिखाया गया।

सोवियत संघ के विघटन और तज्जन्य एक ध्रुवीय विश्व तथा पूंजी का ध्वज उठाए अमेरिका की अगुवाई में पाश्चात्य देशों की दरोगा गिरी का उग्र रूप इस तथाकथित भूमंडलीय दौर से सामने आ रहा है उसमें मास मीडिया पर केवल और केवल पूंजी के विभिन्न रूपों यथा बाजार विज्ञापन उच्च तकनीकी ग्लैमर व्यक्ति को पद्य में बदलने के चित्र तथा समग्र व्यवस्था के भीतर आवाज छलिए अतिक्रमण दृश्य दृश्य वातावरण के अतिरिक्त कुछ सामने नहीं आ रहा है ऐसी स्थिति में आम आदमी के मुश्किल से स्पेस पा रहा है आदिवासी जीवन की बातें तो अलग है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो सिनेमा में आदिवासियों के यथार्थ को चित्रित करने वाली गिनी चुनी फिल्में सामने आती हैं आदिवासियों पर केंद्रित लाल सलाम नाम फिल्म करीब एक दशक पहले आए लेकिन जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया जहां नक्सलवाद प्रमुख है और आदिवासी बाद में “मृगया” फिल्म में आदिवासियों के शोषण को काफी अधिकारिता के साथ दिखाया गया है महबूब की फिल्म रोटी में पूर्वोत्तर के आदिवासियों जीवन का चित्रण शामिल है हां बांग्ला भाषा में सत्यजीत रे ने आदिवासी जीवन को लेकर एक दमदार फिल्म बनाई जिसमें सिम्मी को नायिका के रूप में प्रस्तुत किया इस फिल्म का नाम है और “अरण्येर दिन रात” है जिसका हिंदी संस्करण जंगल में एक दिन रात के रूप में आया फिल्म में गैर आदिवासी युवकों का एक दल पिकनिक मनाने आदिवासी अंचल में जाता है 1 दिन और रात दल के सदस्य जंगली इलाके में गुजरते हैं तब ही उसका संपर्क आदिवासियों से होता है या संपर्क आदिवासी जीवन शैली के प्रभाव के रूप में संतों की जीवन दृष्टि को बदल सकने की ताक़त दिखाता है उन युवकों को आदिवासी जीवन में ऐसा बहुत कुछ मिला जो उनके जीवन में सीखने के लायक था साहनी की कहानी पर आधारित एक सीरियल बहुत पहले प्रसारित हुआ था जिसका नाम था काला जल यह सीरियल बस्तर के इलाके को लेकर बनाया गया जिसमें वहां के आदिवासी जीवन की झलक मिलती है गिने चुने टांगो को छोड़कर सनी मावा सीरियलों में आदिवासियों का चित्रण रोमांटिक क्या जंगली सिद्ध करने जैसी नजरिए से ही किया गया है यहां तक कि राज कपूर जैसे फिल्मी निर्देशक ने अपनी फिल्म राम तेरी गंगा मैली में पहाड़ी इलाके की आदिवासी लड़की द्वारा स्वयंवर में माला पहन कर अपना साथी चुनने का दृष्ट शामिल किया गया जबकि ऐसा कोई परंपरा आदिवासियों में नहीं है चैन के आधार पर इच्छा अनुसार पति चुनना अलग बात है मुंबई या हिंदी फिल्म में आदिवासी जीवन पर आधारित फिल्म अभी तक सामने नहीं आई है जहां तक डॉक्यूमेंट्री का सवाल है इसमें श्रीप्रकाश पंकज मेघराज झारखंड से आदिवासियो पर महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट्री बनाई है ना कमेंट्री के साथ यह दिक्कत है कि वह मास मीडिया की सैलरी में पूरी तरह नहीं आती बल्कि एक सीमित अर्थ में ही उन्हें मास मीडिया का हिस्सा माना जा सकता है लेकिन मीडिया में एकाधिक ब्लॉक यात्रा आदिवासी जगत जैसे कुछ कदम उठाए गए अन्यथा ब्लॉक सहित आकुल ट्विटर फेसबुक या फेसबुक वगैरा में आदिवासी कवरेज नहीं के बराबर है राष्ट्रीय स्तर के हिंदी अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्रों के न्यूज़ कवरेज का विश्लेषण किया जाए तो 90 के दशक के बाद आदिवासियों से संबंधित खबरें या फीचर बहुत कम देखने को मिलती हैं इस क्षेत्र में हिंदू एवं जनसत्ता अखबार जरूर गंभीर रहे हैं खासकर जनसत्ता के आदिवासी मुद्दों को न्यूज़ एवं फीचर दोनों का ही हिस्सा बनाने का महत्वपूर्ण काम किया है बौद्धिक विचार व साहित्यिक पत्रिकाओं का जहां तक सवाल है तो इस क्षेत्र में गिनी चुनी पत्रिकाओं या कुछ पदों के चुनिंदा विशेष सामने दिखते हैं इनमें उदयपुर से प्रकाशित अरावली उद्घोष संपादक वर्मा जी को राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की नियंत्रित मासिक पत्रिका के रूप में देखा जा सकता है अन्य पत्रिकाओं को आम आदमी ने वर्ष 2002 में आदिवासियों पर केंद्रित दो महत्वपूर्ण अंक में प्रकाशित हुए रायपुर से आदिवासियों द्वारा संपादित पत्रिका होती है इस तरह अखाड़ा नाम के द्वारा रांची से प्रकाशित की जाती है झारखंड में इस प्रकार प्रिंट मीडिया के खून से देखा जाए तो कुल मिलाकर अत्यल्प कार्य हुआ है चाहे बाद प्रिंट मीडिया की हो या लर्निंग मीडिया की आदिवासी जीवन को दिया जाने वाला स्पेस नग्न है और जो स्पेस दिया जा रहा है उसमें रोमांटिक जिसको अधिक नजर आता है 1970 के दशकों की कॉपी फिल्म में आइटम सॉन्ग के रूप में आदिवासियों को प्रदर्शित किए जाने की एक प्रवृत्ति देखी जा सकती है या वैसा ही है जैसे गणतंत्र दिवस की झांकियों में आदिवासी विषय की इस पक्ष पर भी चर्चा किया जाना मुनासिब होगा की मुख्यधारा से जुड़े मीडिया में आदिवासी समुदाय के कितने अजीब पत्रकारिता अभिनय व प्रबंधन से जुड़े हैं यहां जोर आदिवासी विषय वस्तु है ना कि आदिवासियों का प्रतिनिधित्व आरक्षण का सवाल किसी फिर भी मुख्यधारा की मानसिकता समझने के लिए यह मुद्दा प्रसांगिक हो जाता है वास्तविकता को जानने के लिए हमारे सामने कोई शोध उपलब्ध नहीं है जितनी सूचनाएं सामने आई हैं उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इक्के दुक्के को छोड़कर प्रतिनिधित्व नग्न है आदिवासी जीवन से जुड़ी विषय वस्तु के विभिन्न पक्षों के सवाल समस्या उनके समाधान ओं के भीतर प्रवेश के लिए जरूरी है कि जो लोग आदिवासी जीवन से सीधे सीधे जुड़े हुए हैं उनका सहयोग प्रतिनिधित्व के स्तर पर लिया जाए तो आदिवासी जीवन की वास्तविकता काफी हद तक सामने आ सकेगी यह इसलिए है कि आदिवासी लोग भारतीय समाज का एकमात्र तबका है जो अलग-थलग पड़ा हुआ है शेष समाज से अभी तक अपेक्षित स्तर पर नहीं जुड़ पाया है दुखद आश्चर्य पैदा करने वाला एक ऐसा उदाहरण यहां देना उचित लग रहा है जिस में आदिवासियों को कैसे प्रचलित व प्रसारित किया गया यह देखने वाली बात है घटना यूं ही है कि एक आदिवासी परिवार जंगल के किस कोने में पीढ़ियों से रहता आया है उसे अदालत में यह साबित करना है कि वह उसी परिवार की है परिवार का मुखिया अदालत में हाजिर होता है अदालत उसे पूछती है जहां तुम कह रहे हो वह जगह तुम्हारी है इसका क्या प्रमाण है कई तारीख पेशियों में वह आदिवासी कोई सबूत पेश नहीं कर पाता है उसके पास कोई दस्तावेज नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि वह जमीन उसकी है बहुत सोच-विचार कर व्यक्ति अदालत में संकल्प करता है कि मेरा मुकदमा खारिज मत करो मैं अगली तारीख पेशी पर प्रस्तुत कर दूंगा अदालत उसे अंतिम अवसर देती है तारीख पर वह व्यक्ति अदालत में पेश होता है और पत्थर का एक टुकड़ा वृक्ष की एक अदालत को दिखाते हुए पूरे विश्वास के साथ यह दावा करता है कि उनका यह टुकड़ों से मेरे घर के आंगन की और यह कुआं उसकी है जो मेरे बुजुर्गों ने मेरे घर के आंगन में लगाया था अदालत यह दावा दृश्य देखकर स्तंभ रह जाती है उस व्यक्ति और उसके परमाणु की तरफ से देखते हैं और कुछ क्षणों के लिए मौन धारण कर लेता है वह उधेड़बुन में है कि परमाणु को मान लिया जाए या नहीं अदालत का फैसला अपनी जगह है पर हाल मीडिया ने अपना फैसला इस खबर शीर्ष से दे दिया पागल पहुंचा अदालत में खबर के शीर्षक के निहितार्थ बहुत गहरे और व्यापक हैं अगर इस पर गहराई से सोचा जाए न्याय प्रणाली उस कानूनों पर आधारित होती है जिन्हें किसी राष्ट्र समाज की मुख्यधारा के जनमानस की परंपराओं भावनाओं और शर्तों अपेक्षाओं के अनुरूप बनाए जाते हैं जमीन के मालिकाना हक के संबंधित कानून के प्रावधान है कि जमीन का कोई टुकड़ा किसी व्यक्ति की मलकिया नत तभी होगा जब वह वंशानुगत या क्रय किया हुआ अथवा मतदान बख्शीश में प्राप्त और तदनुसार हस्तांतरित हो इसका व कायदा विशेष रूप से वर्तमान काल में दस्तावेज तैयार किया जाता है जो राजस्व रिकार्ड हिस्सा होता है आदिवासी समाज आज भी इस प्रक्रिया से अनभिज्ञ है यह वजह है कि वनाधिकार अधिनियम 2005 के वन जाने के बावजूद आदिवासियों की उनकी पुश्तैनी जमीन पर मालिकाना हक मिलने में कई प्रकार की कठिनाई आ रही हैं।

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उनके पास जमीन होने का एकमात्र अधिकार है और उसका अगले किए नहीं हुआ ऐसी दशा में एक चांद का टुकड़ा को बतौर सबूत अदालत में पेश करता है तो मुख्यधारा के कानूनी प्रावधान में नहीं आता क्योंकि ऐसे विधि निर्माताओं ने कभी सोचा ही नहीं था मुख्यधारा की व्यवस्था की सीमाएं अपनी जगह है उस आदिवासी प्रकार के दावे में भी दम है इसे प्राकृतिक अधिकार की दृष्टि से नकार ना उसके लिए अन्याय की बात है

मीडिया की दृष्टि क्या हो ?

इस सवाल का जवाब अभी भी शेष है मीडिया की भूमिका में तथ्यात्मक सूचना का प्रचार प्रसार मनोरंजन एवं जन चेतना फैलाना मुख्यता है प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सूचना उपलब्ध कराना भी जन चेतना का ही हिस्सा है स्वस्थ मनोरंजन जीवन में अपनी महत्व रखना ही है यहां आदिवासी समाज में जन चेतना पैदा करने का मुद्दा सामने आता है प्रजातांत्रिक प्रणाली में संश्लिष्ट समाज के निर्माण का दूसरा मुद्दा सामने आता है प्राकृतिक अधिकारों की दृष्टि से उस आदिवासी परिवार के पुश्तैनी जमीन पर उसका अधिपति स्वीकार करने का मुद्दा केंद्र में ही है इन सारे बच्चों को देखते हुए मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए और मीडिया में पूर्वोत्तर से क्या खबर साया करके कौन सी भूमिका निभाई यह गंभीर विचारणीय विषय है हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें मीडिया के लिए बाजार में बिक्री योग्य तथाकथित सेलिब्रिटी न्यूज़ मैनिपुलेशन टीआरपी तेज न्यूज़ महत्वपूर्ण है ना की किसी के मौलिक अधिकारों का प्रश्न इस खबर की घटना की दृष्टि में जमीन का मालिकाना हक जैसा जीवनधारा अधिकार ट्रायल पर है और मीडिया उस अधिकार के दरवाजे को पागल करार दे रहा है या सवाल उठाया जाना कितना तार्किक होगा कि वह आदिवासी पागल है या मीडिया? अपने अधिकार के लिए लड़ने वाले उस आदिवासी के लिए क्या सत्य पर आधारित मीडिया ट्रायल संभव नहीं था? जमीन के हक की लड़ाई लड़ने वाले झारखंड के उस आदिवासी परिवार का यह उदाहरण एक का घटना नहीं है प्रत्येक आदिवासी समाज के जल जंगल जमीन के लिए लड़ाई का व्यापक मुद्दा है जो उस समाज का मौलिक अधिकार है जिसे सरकार ने भी वनाधिकार अधिनियम के तहत स्वीकार किया है इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने नंदी बाई के प्रकरण में 5 जनवरी 2011 को अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है ऐसी वास्तविकता को नजरअंदाज करने वाले मीडिया का चरित्र और दृष्टिकोण यहां पर लक्षित होता है इसलिए जब मीडिया और आदिवासी जैसे विषय पर चर्चा होती है तो मीडिया से बहुत जिम्मेदार व गंभीर होने की अपेक्षा की जाएगी।

Dr Santosh Verma

ये लेखक के निजी विचार हैं।आजक्याका इससे सहमत अथवा असहमत होना आवश्यक नहीं है।