BY: Babu Singh ADV

लंबे अंतराल से साहित्य साधना में रत हिंदी साहित्य की उर्वर धरती को अपनी श्रंगारिक और सामाजिक सरोकार की रचनाओं से अभिसिंचित कर रहीं देश की ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठित रचनाकार सहज सरल सौम्यता की प्रतिमूर्ति डॉ सुमन सुरभि जी एक कुशल गृहणी होने के साथ साथ स्वतंत्र रूप से लेखन का कार्य करते हुए हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं के सुमनों से सुरभित कर रही है। 

Suman Surbhi

डॉ सुमन जी कविता को जीवन में ढालकर हिंदी साहित्य को प्रीति के सागर की अनन्त गहराइयों में ले जाकर गीत गज़ल दोहा छंदों की रूमानियत प्रदान कर रही हैं । जिससे हिंदी के प्रतिष्ठित काव्‍य मन्च भी उनकी साहित्य साधना ,अंतर्मन की मृदु वाणी व शब्दों की रसधार से ऊंचाइयों को प्राप्त हो रहे हैं। वर्तमान में सुमन जी की रचनाओं को देश के प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में स्थान तो मिल ही रहा है वहीं विदेशी हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में भी अपना स्थान बनाये हुए है । वहीं काव्‍य मंचों पर भी साहित्य प्रेमियों द्वारा सुमन जी की रचनाओं की भूरि भूरि सराहना हो रही है। डॉ सुमन जी की रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी, दूरदर्शन , अन्‍यान्‍य साहित्‍यिक मंचों, व वेब चैनलों पर भी होता रहता है। 

डॉ सुमन जी द्वारा रचित पुस्तक  @ दिल की कलम से @  का प्रकाशन निहारिकांजलि प्रकाशन द्वारा वर्ष 2015 में किया गया जिसे हिंदी साहित्य जगत में बहुत सराहन प्राप्त हुई। सुमन जी कविता लेखन का कार्य अपने विद्यार्थी जीवन से कर रही हैं वे कहती हैं कि जब कोई रचना पूर्ण होती है तब अत्यंत ही आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है श्रंगार को कविता में ढालकर लयबद्ध करना अत्यंत रुचिकर लगता है। 

दिल की कलम से पुस्तक क्या इंगित करती है ? इस पर वे कहती हैं कि अंतर्मन की कोमल भावनाओं को अभिब्यक्ति के माध्यम से प्रेम की संजीवनी देना है। प्रेम के आनन्द में विभोर मन की अनुभूतियों को पटल पर लाने का प्रयास है। जिसमें निज भावनाओं को निश्छद्म और प्रेम की निश्छल अभिव्‍यक्ति देने का प्रयास है।

वर्तमान काव्‍य मंचों पर बात करते हुए सुमन जी कहती है कि पहले काब्य मंच अनुशासित रहते थे पिंगल अनुशासित रचनाएं पढ़ी जाती थी पर अब दिन पर दिन काब्य मंचों पर गिरावट आ रही है   कथित साहित्यकारों ने काब्य मंचो को ब्यवसाय बना दिया है। कविता के नाम पर केवल सत्ता का यशगान यह एक शुद्ध साहित्य के लिए अच्छा नही है।  सुमन जी नवागत रचनाकारों को राय देते हुए कहती है कि कविता लेखन कार्य कठिन व गतिमान भी है । पहले निर्धारित करें कि किस विधा में लिखना चाहते हैं उस क्ष्रेत्र के अच्छे साहित्यकारों के साहित्य का अध्ययन करें वर्तमान में घटित घटनाओं व प्राकृतिक दृश्यों का अध्ययन करें मन में एक अवधारणा बनाएं और उसे लिपिबद्ध करें जब मन केंद्रित हो तब उसे विस्तार दें । मीडिया से जुड़ें।

अपनी भाषा शैली और मृदु वाचन की कला से सुमन जी काब्य मंचो पर अपने सुरीले कंठ से एक सम्मोहन उतपन्न कर लेती हैं । डॉ सुमन जी को विक्रमशिला विद्यापीठ उज्जैन से विद्यावाचस्पति की उपाधि से विभूषित किया जा चुका है। इसी क्रम में सारस्वत सम्मान, साहित्य साधना सम्मान सहित दर्जनों सम्मानों से उनकी उत्कृष्ट साहित्यक सेवाओं के लिए नवाजा जा चुका है । 

कानपुर महानगर में जन्मी डॉ सुमन जी मूलतः जनपद बस्ती की रहने वाली है परंतु दाम्पत्य जीवन जनपद महोबा से जुड़ा है इन्होंने उच्च शिक्षा की पढ़ाई बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी से पूरी किया। वर्तमान समय में डॉ सुमन जी लखनऊ महानगर में  अपने  जीवन संगी के साथ एक पुत्र व दो पुत्रियों सहित गृहस्थ जीवन की सम्पूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए काब्य मंचो की ब्यवसायिकता से दूर  विशुद्ध साहित्य साधना में रत हैं।

 अंत मे उन्ही की चार पंक्‍तियाँ….

घुला है रंग इतना नफरतों का क्यों फिजाओं में
बिखरती गन्ध है बारूद की हर – सू हवाओं में
है हर अनजान सा चेहरा हरेक तस्वीर धुंधली है
दिलों में प्यार की तो ऐ ‘सुमन’ ऐसी कमी न थी