प्रस्तुतिः- डाॅ. सुमन सुरभि

हे नवल वर्ष! अभिनन्दन है।

नहीं सहज है विस्मृत करना
जो संत्रास सहा जन – जन ने
हरि इच्छा तो हरि ही जाने
जीना सीख लिया जीवन ने
संकट से लड़ती सांसों में
अब भी थोड़ा क्रंदन है,,,,
हे नवल वर्ष! अभिनन्दन है।

नव पल्लव सी आशाओं ने
फिर खोले हैं संपुट अपने
पीड़ा दग्ध सजल आंखों ने
आंज लिए हैं फिर से सपने
तेरा आना, जनमानस को
जैसे शीतल चंदन है,,,,,
हे नवल वर्ष! अभिनन्दन है।

सुख दुःख की इस धर्म-तुला पर
सुख का पलड़ा भारी लाना
अधिक पुष्प हों, कांटे सीमित
ऐसी जीवन-क्यारी लाना
कल उगते सूरज के संग संग
तेरा कोटिश वंदन है,,,,,
हे नवल वर्ष! अभिनन्दन है।