खुशी-गम की पहेली को जरा सुलझा लिया जाए,
जमाना जिनको ठुकराये उन्हें अपना लिया जाए.
वो जिनके जख्म अक्सर ही जमाना छेड़ देता है,
लगा मरहम अब उनके जख़्म को सहला लिया जाए.
जो बचपन तंग गलियों से कभी होकर नहीं गुजरा,
उसे कुछ देर उन राहों में भी टहला लिया जाए.
हजारों बार चकनाचूर हो कर जो बिखरते हैं,
उन्हीं ख़्वाबों से फिर उम्मीद का वादा लिया जाए.
गुरूरो-जेहनियत की कैद में जकड़े हैं रिश्ते जो,
उन्हें आओ करें कोशिश कि अब छुड़वा लिया जाए.
सभी मिलकर चलो ढूँढ़े गुमी फितरत वो इन्सानी,
कि फिर इन्सां को अपने आप से मिलवा लिया जाए.
सफर तन्हा है तय करना ‘‘अदा’’ जब जिन्दगानी का,
न क्यूँ फिर मन्जिलों का फैसला तन्हा लिया जाए.

रीता “अदा”
   (दिल्ली)